Tuesday, June 3, 2014

बस एक शे'र छोड़े जा रहा हूँ फिलहाल  लिये… पूरी ग़ज़ल बहुत जल्द हाज़िर करूँगा

तेरी आना के सामने मेरी वफ़ाऐं  हैं ,
तखत पे धूल  फांकती हुई किताब कोई !


अर्श 

Friday, April 19, 2013

ये पीपल हो गया पागल ख़ुशी से ...


लफ्ज़ पर चली तरही पर एक ग़ज़ल मेरी भी हुई थी , आइये उसी को सुनते हैं !
ये पीपल हो गया पागल ख़ुशी से
कि बगुले लौट आये नौकरी से
सफ़र पर आज भी मैं इक सदी से
गुज़रता जा रहा हूँ ख़ामुशी से
मेरे क़िरदार में है रात होना
मुहब्बत कैसे कर लूँ रौशनी से
ख़ुदा क़ुर’आन की इन आयतो को
हक़ीक़त कर दे अब तो कागज़ी से
मेरे भीतर ही इतने मस’अले हैं,
शिक़ायत क्या करूँ मैं ज़िंदगी से
ये सूरज डूब कर जाता कहाँ है
चलो हम पूछ लें सूरजमुखी से
तुला हूँ नींद अपनी बेचने पर ,
मेरे जब ख़ाब निकले मामुली से
तबाही का वो मंज़र है अभी तक ,
कभी गुज़रे नहीं क्या उस गली से
मेरे इस राज़ को रखो दबा कर
कि तुमको चाहता हूँ बेरुख़ी से
सज़ा में ख़ुदकुशी बरतो मुझे अब
मैं उकताया वकीली पैरवी से
रवायत की गली वाली तुम्हारी
“मैं आजिज़ आ गया हूँ शायरी से
अर्श 

Wednesday, November 14, 2012

घना जो अन्धकार हो तो हो रहे तो हो रहे !!


बहुत दिन हो गए थे इस कोने आये हुए ! सबसे पहले तो दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं आप सभी को ! गुरु देव पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर एक तरही चल रही है दीपावली के शुभ मौके पर सो वहीँ के लिए लिखी ये ग़ज़ल आप सभी को भी नज़्र है !

अगर वो अश्क़बार हो तो हो रहे तो हो रहे !
जो वक़्त शर्मसार हो तो हो रहे तो हो रहे !!

ये मोजिज़ा मुझे भी एक बार तो नसीब हो ,
की दाग़ दाग़दार हो तो हो रहे तो हो रहे !!

मुझे अजीज़ है मेरा ये ख़ुद से इंक़लाब भी ,
जो ग़म भी शानदार हो तो हो रहे तो हो रहे !!

मुझे चराग़-ए-इश्क़ ने तो बख्श दी है रौशनी ,
घना जो अन्धकार हो तो हो रहे तो हो रहे !!

ये एहतियात क्या कोई करे है इश्क़ में कहीं ,
जो दिल भी बेक़रार हो तो हो रहे तो हो रहे !!

रगों में आशिक़ी मेरी जुनू-ए-इश्क़ है मेरा ,
दीवानगी में यार हो तो हो रहे तो हो रहे !!

लहू में इख्तालाब हो अजियतों के वास्ते ,
जो अर्श ज़ार ज़ार हो तो हो रहे तो हो रहे !!

अर्श

Thursday, March 8, 2012

मैं लम्हा हूँ कि अर्सा हूँ कि मुद्दत

होली की सभी को बहुत शुभकामनाएँ ! और इसी के साथ आईए सुनते हैं एक नई ग़ज़ल !


बडी हसरत से सोचे जा रहा हूँ
तुम्हारे वास्ते क्या क्या रहा हूँ

वो जितनी बार चाहा पास आया
मैं उसके वास्ते कोठा रहा हूँ

कबूतर देख कर सबने उछाला
भरी मुठ्ठी का मैं दाना रहा हूँ

मैं लम्हा हूँ कि अर्सा हूँ कि मुद्दत
न जाने क्या हूँ बीता जा रहा हूँ

मैं हूँ तहरीर बच्चों की तभी तो
दरो-दीवार से मिटता रहा हूँ

सभी रिश्ते महज़ क़िरदार से हैं
इन्ही सांचो मे ढलता जा रहा हूँ

जहां हर सिम्‍त रेगिस्‍तान है अब
वहां मैं कल तलक दरिया रहा हूँ

अर्श

Tuesday, October 25, 2011

मैं जानूँ या तू जानें...


सबसे पहले तो आप सभी को दीपावली की ढेरो शुभकामनाएं ! दीपावली के इस ख़ास पर्व पर चालिये सुनाता हूँ , एक ग़ज़ल ! उसी वादे के साथ की बह'रे ख़फ़ीफ़ से अलग किसी बह'र पर नई ग़ज़ल आपको सुनाउंगा ! तो चलिये सुनते हैं ऐसी ही एक ग़ज़ल ...
शुभ दीपावली

हम दोनों का रिश्ता ऐसा, मैं जानूँ या तू जानें!

थोडा खट्टा- थोडा मीठा, मै जानूँ या तू जानें !!


सुख दुख दोनों के साझे हैं फिर तक्‍सीम की बातें क्‍यों,

क्या -क्या हिस्से में आयेगा मैं जानूँ या तू जानें!!


किसको मैं मुज़रिम ठहराउँ, किसपे तू इल्ज़ाम धरे,

दिल दोनों का कैसे टूटा मैं जानूँ या तू जानें!!


धूप का तेवर क्यूं बदला है , सूरज क्यूं कुम्हलाया है ,

तू ने हंस के क्या कह डाला , मैं जानूँ या तू जानें!!


दुनिया इन्द्र्धनुष के जैसी रिश्तों मे पल भर का रंग,

कितना कच्चा कितना पक्का मैं जानूँ या तू जानें!!


इक मुद्दत से दीवाने हैं हम दोनों एक दूजे के ,

मैं तेरा हूँ तू है मेरा , मैं जानूँ या तू जानें!!


आप सभी का

अर्श

Thursday, September 15, 2011

नींद से कुछ लिया दिया होगा ...

वाकई बहुत दिन गुज़र गए ! एक लम्बे समय के बाद फिर से चलिए नई ग़ज़ल के साथ, आप सभी के पास हाज़िर हूँ! हालांकि ग़ज़ल तो पूरानी है, मगर आप सभी के सामने पहली बार आ रही है ... बह'र वही फिलहाल ख़फ़ीफ है इस बार भी ... कुछ ज़्यादा भूमिका नहीं बनाते हुये हाज़िर करता हूँ... इस ग़ज़ल को ... क्यूंकि सफर है, तो चलना है ,और चलने का नाम ज़िन्दगी है !



नाम ज्यूं ही मेरा सुना होगा !
उसने पर्दा गिरा दिया होगा !!

मैं तो ख़ुद जी रहा था टुकडों में,
ख़्वाब टुकडों में पल रहा होगा !!

ज़िक्र मेरा वो सुन के देर तलक ,
पागलों की तरह हंसा होगा !!

अपनी कारीगरी से बादल ने ,
तेरा चेहरा बना दिया होगा !!

मांग बैठा था कुछ ज़ियादा वो
इसलिये कुछ नहीं मिला होगा !!

भूख से रात हो गई लम्बी ,
दिन भी अब मुश्किलों भरा होगा !!

उसकी चाहत भी तो ज़रूरी है ,
बस मेरे चाहने से क्या होगा !!

फिर समन्दर की चाहतें लेकर,
चाँद आँखों में आ गया होगा !!

आँख ने ख़्वाब की तिज़ारत में,
नींद से कुछ लिय दिया होगा !!



अर्श






Saturday, April 23, 2011

उम्र का ये पड़ाव कैसा है !

नमस्कार आप सभी को , देरी के लिए मुआफी भी चाहूँगा ! कुछ ऐसी मसरूफियत जिसकी कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती ! और इसी वजह से ग़ज़ल को आप सभी तक लाने में देर हुई ! चलिए एक पुरानी ग़ज़ल आप सभी को सुनाता हूँ ! बह'र वही खफिफ़ .......इधर हाल ही में सीहोर जाना हुआ और पूरे गुरुकुल का जमावड़ा रहा ! बहुत मज़ा आया ! अगली बार फिर से एक नई ग़ज़ल के साथ हाज़िर होने के वादे के साथ ...



उम्र का ये पड़ाव कैसा है !
ख्वाहिशों का अलाव कैसा है !!

हसरतें टूट कर बिखर जाये ,
काइदों का दबाव कैसा है !!

जो कभी सूख ही नहीं पाता,
ये मेरे दिल पे घाव कैसा है !!

मैं उलझ कर फंसा रहा जिनमें,
इन लटों का घुमाव कैसा है !!

जिसको देखो बहा ही जाता है,
इस नदी का बहाव कैसा है!!

बेमज़ा जिंदगी है इसके बिन,
तेरे ग़म से लगाव कैसा है!!

कर चुके दफ़्न अर्श ख्‍वाबों को
फिर ये जीने का चाव कैसा है!!


अर्श