Sunday, November 1, 2009

रिश्ते का मजमून

मुझे नहीं पता इस रचना ने कैसे जन्म लेली मेरे अंदर ,...और फ़िर मैंने इसे कागज पर उकेर दिया ,... आप सब के सामने हाजिर है दुआ करें और प्यार दें...


सर्दी की रात
चाँदनी छत पर पसरी हुई
हम दोनों
बालकनी से उसे छूते हुए
शब्द शून्य थे
समय की संकीर्णता
हलकी सी सिहरन
मगर
अजब सा पशोपेश
मेरा पलटना
फ़िर
उनका कहना
जी !!!! सुनते हो
सच
रिश्ते का मजमून था ?
ये



आपका 'अर्श'

35 comments:

  1. बहुत सुन्दर है "रिश्तो का मजमून" और फिर ये मजमून अनायास तो नहीं जन्म लेते

    ReplyDelete
  2. अर्श भाई
    दिल को छूती बेहतरीन रचना ....

    ReplyDelete
  3. आह! अब क्या कहूं --------सिर्फ़ कुछ शब्द ही कभी कभी सब कह जाते हैं । थोडे मे ही बहुत कुछ कह दिया।

    ReplyDelete
  4. क्या खूब! सिहर गया मैं...।

    ReplyDelete
  5. कविता की सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि आपने इसी उम्र में इस एहसास को शब्द देने, कविता बनाने की सामर्थ्य पैदा कर ली. दूसरी खसूसियत, आपने खुद के भीतर स्त्री मन पैदा करके यह रचना गढ़ी. शब्दों, लहजे के एतबार से भले ही पुल्लिंग ध्वनित हो परन्तु पूरा मसला स्त्री मन वाला है. पुरुष को चांदनी, प्रकृति वगैरह कहाँ नजर आते हैं, वो तो सिर्फ अपना चाँद देखता है. मैं शायद इस कविता पर अपनी बात सही ढंग से कह नहीं पा रहा हूँ ... लिहाज़ा, बधाई के साथ विदा.

    ReplyDelete
  6. रिश्तों की मिठास है इसमें

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर रचना है बधाई।अर्श जी,कविता ऐसे ही जन्म लेती है....अचानक.....पता नही कहाँ से प्रकट हो जाती है....

    ReplyDelete
  8. अर्श जी .......... ये अनजाने ही नहीं ............ प्यार की शुरुआत है .......... जो अनजाने ही आपके मन में आयी है ..... धीरे धीरे अपना रूप भी ले लेगी ........... बहूत लाजवाब है ........

    ReplyDelete
  9. Vandana ji ki post mein ek khat ka jikra hai ......aur aapki post mein wo rishta.....aapki poetry lekhan ke bare mein nahi jante they ham... achcha hai ye bhi

    ReplyDelete
  10. ए जी ....!!!!!

    ओये होए .....!!

    सर्द चांदनी रात में छत पे ....ए जी के साथ .....?????

    सुभानाल्लाह ......मुबारकां जी मुबारकां .....!!!

    ReplyDelete
  11. bahut khoob arsh, swapn deekhne lage hain , satya bhi hone wale hain lagta hai. behatareen abhivyakti.

    ReplyDelete
  12. वाह अर्श भाई क्या बात है, बहुत सुंदर.
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  13. ek line hai
    isee mauke kee
    toote chhappar tale chaandnee beente
    sone se din bhee usne vitaaye bade
    jab adhar maun ho nain bhaavo bhare
    uske sunne vyathaa tum bhee rukte zaraa
    ( Ramesh Sharma )

    to bhaiyaa
    kah to diya azee sunte ho
    ab tham lo aanchal
    jamanaa jo kagegaa
    ( kah lene do )

    sundar bhav
    bebaak
    badhaai

    ReplyDelete
  14. वाह-वा !!
    अर्श भाई ,
    इस एहसास की
    मखमली आमद मुबारक हो....
    रिश्ते का मज़मून तो कहीं
    अन्दर ही होता है ...
    चांदनी को छू लेने की
    मधुर कोशिश में ही कहीं ....
    मन के गहरे ,
    कोमल , रेशमी एहसासात को
    बहुत ही खूबसूरत अल्फाज़ दे कर
    मुकम्मिल किया है आपने....
    यही तो है कविता का जन्म ....

    दिगंबर जी की राए से सहमत हूँ
    आपसे मिलना पडेगा ...
    waheeN 'C.P.' ke usee park meiN...!!

    ReplyDelete
  15. he he :) Good One aapki to baat ban gayee.. humne apne blog par apni hi baat bigaad rakhi hai :P

    ReplyDelete
  16. बहुत सुंदर एहसास ..

    ReplyDelete
  17. vaah beta kyaa baat hai ye rishte kaa majaboon to bahut sundar hai aur ye kisee aane vaali khishee kee nishaani hai | bvahut sundar kavita hai bahut bahut badhai jaldi me comment de rahi hoon baad me is mazamoon ko fir se acchee tarah samajhoongee aur kaan pakad kar poochhoongi maa ko bataye bina mazjmoon bhi banane lage kyaa baat hao ? bahut bahut aasheervaad isi tarah khush raho | baaki kal fir ati hoon yaa shaam ko

    ReplyDelete
  18. prem bhare bhav...rishto ke sundar ahsaas....waah....badhai....

    ReplyDelete
  19. कुछ कहा कुछ सुना ...बिना कहे सब सुना , एक रिश्ते की पुलिया सी बनाते हुए ...

    ReplyDelete
  20. वाह अर्श भाई रिश्ते के मजमून का क्या एहसास है...
    बहुत दिनों से ब्लॉग पर आ नहीं पाया था सो माफ करना। सुन्दर रचना...

    ReplyDelete
  21. arsh bhai,
    ye jo " E JEE" he na, bada dilchasp he/isame alag hi andaaz he, kasheesh he aour jab pahli baar kisike muh se suna jataa he to mashaaallah..bas aanand aa jaataa he mano sab kuchh mil gaya. rishte ke bandhan ke liye sabse badi gaanth yahi he/
    bahut shaaleen rachna..

    ReplyDelete
  22. जो रचना इस प्रकार से जन्म लेती है, उसमें हृदय-पक्ष उभर कर आता है क्योंकि इसमें कृत्रिमता नहीं होती. इतना ही नहीं, पढ़ने वाले के हृदय के तारों को भी झंकारने में सक्षम होती है. सुन्दर रचना है.

    ReplyDelete
  23. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  24. aadil rasheed
    to me

    show details 10:38 PM (7 minutes ago)

    mashah allah

    ReplyDelete
  25. प्रकाश, ये नया अवतार तो खूब है!

    ReplyDelete
  26. कागज़ पर उकेरा भी क्या खूबसूरती से..

    ReplyDelete
  27. बहुत ही khubsurati से मन के komal ahsaason को kagaz पर ukera है..कुछ कहते ,कुछ chhupaate hue !

    ReplyDelete
  28. हम्म्म्म्म..... कुछ तो है इस अजी सुनते हो के पीछे...! कुछ अगढ़ मतले..कुछ बेबहर शेर और अब ये अकविता.....!!!!!!!!

    और फिर कहते हो कि मैं आपसे कुछ नही छिपाता...!

    any ways बिंदाऽऽऽऽऽस

    ReplyDelete
  29. अर्श भाई ..
    एक तो ये बताएं...के ऊपर से १५ नंबर वाले अनाम जी का मुंह ऐसे क्यूँ लटका हुआ है....:(

    और बालकनी की पढ़ते ही हमें सबसे पहले अपने jhon की याद आई...

    फिर ऐ जी, सुनते हो पढा तो ....( वो परदे के पीछे बज-बज / आमंत्रित करते हैं कंगन )

    फिर कहते हो कुछ नहीं है / कुछ भी नहीं है....
    अब तो कह दो..

    ReplyDelete
  30. नायाब गज़ल
    यह शेर तो याद हो गया-
    तिनके तिनके से बनाया घोसला
    टूटकर बिखरा तो फिर तिनका हुआ

    ReplyDelete
  31. कभी-कभी ये आँखें खुद ब खुद डबडबा जाती हैं.....क्या बात कही है....बहुत सुन्दर शायरी है

    ReplyDelete

आपका प्रोत्साहन प्रेरणास्त्रोत की तरह है,और ये रचना पसंद आई तो खूब बिलेलान होकर दाद दें...... धन्यवाद ...