Friday, June 25, 2010

मेरे महबूब से वो जल रहे हैं ...

हालाँकि गर्मी से निजात अभी पूरी तरह से नहीं मिल रही , मगर कुछ बुन्दा बांदी होने लगी है !और अब ग़ज़ल जो धडकनों में दफ्न है, मचलने को आतूर होने लगी है , इसी सिलसिले में आज एक मुक्तक पेश कर रहा हूँ , अगर कभी ग़ज़ल मुकम्मिल बन गयी तो जरुर आप सभी के सामने रखूँगा ....

सितारे हाँथ अपने मल रहे हैं !
मेरे महबूब से वो जल रहे है !!

सियासत करने वालों को भी देखा
यक़ीनन पहले वो अजमल रहे हैं !!

अर्श

23 comments:

  1. वाह…………दोनो ही मुक्तक लाजवाब्।

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  2. वाह अर्श भाई !
    ग़ज़्ज़ब मोबाइल शायरी !


    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  3. कता खूबसूरत है...
    पहले दो मिसरे खास तौर से पसंद आए.

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  4. दूसरा शेर पसंद आया.....इतनी बारिशे ब्लॉग पे .कुछ बादल इधर भेजो भाई....

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  5. अर्श भाई,
    बहुत खूब.

    'सितारे हाथ अपने मल रहे हैं,
    मेरे महबूब से वो जल रहे हैं.'

    बहुत अच्छा लगा.

    -राजीव

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  6. वाह ... गजब ...
    दूसरा शेर तो तीर है जी तीर ... क्या बात कही है ...

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  7. bahut bahut sunder

    http://liberalflorence.blogspot.com/
    http://sparkledaroma.blogspot.com/

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  8. इन्तेज़ार है ग़ज़ल का, फ़िलहाल इस उम्मीद भरी दाद से काम चलाएँ।

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  9. सितारे हाँथ अपने मल रहे हैं !
    मेरे महबूब से वो जल रहे है !!
    इस खुबसूरत शेर के साथ आपकी ग़ज़ल मुक्कमिल हो शुभकामना के साथ इन्तजार रहेगा...

    regards

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  10. Puri gazal ka intezaar..... is baar badi der nahi kar di ........

    sitaare haath...... bahut khoobsurat sher :-) hame bhi dikhao aakhir koun hai

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  11. पढ़ भी लिया है और तुम्हारे मुँह से सुन भी लिया है, ग़ज़ल तो अबतक मुकम्मल हो ही गयी होगी।

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  12. ARSH JI AAPKI GAJAL WAKI ME LAJAWAB HE [SWARUP]

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  13. ARSH JI AAPKI GAJAL PADI OR AAPKE BARE ME JANKARI MILI BEHAD KHUSHI HUIE......[SWARUP]

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