Thursday, November 13, 2008

करता है फ़िर गुनाह क्यू रब भी कभी कभी ..

आती है उनकी याद अब भी कभी कभी ।
मिलता हूँ अपने आप से जब भी कभी कभी ॥

रहती थी ,परेशान वो, चेहरा छुपाने में
उतारता था जब नकाब सब भी कभी कभी ।

आई न, नींद उम्र भर इसी, इंतजार में
लगता है आ रही है वो अब भी कभी कभी ॥

लिखता था ख़ुद जवाब, मैं अपने सवाल का
देती न थी, जवाब वो तब भी कभी कभी ॥

हमने क्या बिगाडा "अर्श" के हम बिछड़ गए
करता है फ़िर गुनाह क्यूँ रब भी कभी कभी ॥

प्रकाश "अर्श"
१३/११/२००८

14 comments:

  1. बहुत बढ़िया, कभी कभी नहीं हमेशा की तरह!

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  2. आई न, नींद उम्र भर इसी, इंतजार में
    लगता है आ रही है वो अब भी कभी कभी ॥
    " very loving words and thoughts.."

    bhatkty rhe tanha anjane raston pe hum, mudne lge hai ab rah unkee galii kabhee kabhee.."

    Regards

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  3. आई न, नींद उम्र भर इसी, इंतजार में
    लगता है आ रही है वो अब भी कभी कभी ॥

    बहुत बढ़िया

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  4. arsh..bahut bahut shukriya aap ne geet pasand kiya--main ne isey mahaz 30 min mein prepare kiya tha -is liye khamiyan hain--lekin jaisa us din record ho gaya [by chance] waisa dobara with same 'feel nahin ho paya--is liye khaamiyon ke bawjood aisa ho rakha hai--agar aap chahen to main aap ko email kar dungi--achcha lagata hai agar kisi ko aap ki koi rachna-geet pasand aaye--abhaar sahit-alpana

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  5. सुंदर रचना है भाई... बधाई स्वीकारें....

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  6. वाह ! क्या बात कही है.......बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.खूबसूरत ग़ज़ल है...ऐसे ही लिखते रहें.

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  7. बहुत सुन्दर रचना है.

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  8. बहुत बढ़िया...

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  9. आप सभी पाठकों का मैं दिल से रिणी हूँ ,आप सबों को दिल से आभार प्रकट करता हूँ ,और उम्मीद करता हूँ के इसे ही स्नेह और आशीर्वाद बनायें रखेंगे...

    अर्श

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  10. प्यारे अर्श भाई, ग़ज़लों में आपकी भावाभिव्यक्ति बहुत सुंदर है. थोड़ा उर्दू ज़बान को सुधारने का प्रयास कीजियेगा. दिल्ली में तो अच्छी किताबें भी मिलेंगी आपको. या कोई आस-पास बतलाने वाला मिल जाए, है ना. तो उनसे इस्लाह भी ले सकते हैं.
    आप और बेहतर हो जावें इसी कामना के साथ सदा आपका.

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  11. Behad nazuk ehsaas, ek kasakse bhara hua...is se aage kya kahun??
    Pehlee baar aayee hun aapke blogpe, aage aur padhna chahtee hun !

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