Thursday, November 20, 2008

तेरे दिल से मेरे दिल का रिश्ता क्या ...

तेरे दिल से ,मेरे दिल का रिश्ता क्या ।
तू मिलती, ना मैं मिलता, फ़िर मिलता क्या ॥

सोंच रहा ,क्यूँ तेरा ऐसे नाम लिया ,
याद है अब भी भूलता फ़िर तो भूलता क्या ॥

वो फलक जो दूर तलक जा मिलता है ,
जाता मैं तो वो वहां फ़िर मिलता क्या ॥

याद है आब भी तेरी सांसों की गर्माहट ,
राख हुआ था जलने को अब जलता क्या

वर्षो पहले एक चमन होता था अपना ,
एक भी फुल अब "अर्श"वहां है खिलता क्या ॥

प्रकाश "अर्श"
२०/११/२००८

17 comments:

  1. bhaavpurn rachna hai.
    akhiri sher bahut achcha laga.


    [aap ke epage ko visit kartey samy top par yah likha hua araha hai---TEMPLATE ERROR: Error during evaluation of comment-form]

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  3. बहुत खूब अर्श जी...बेहतरीन रचना...लिखते रहें...
    नीरज

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  4. aakhiri sher khas taur par pasand aaya. bahut khoob andaze bayan

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  5. sanso ki garmahat wali line gazab ki likh daali

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  6. " vo phalak jo dur talak ja milta hai"
    " great thoughts and beautifully expressed"

    regards

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  7. अंदाज़ में मिठास आती जा रही है!

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  8. बहुत खूब !!
    अनोखा अंदाज़ है......
    बहुत उम्दा रचना ......
    शुभकामनाये.........

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  9. बहुत अच्छी रचना लगी।

    वो फ़लक जो दूर तलक जा मिलता है
    जाता मैं तो वो वहां फिर मिलता है।
    क्या बात है!

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  10. आप सभी पाठक गणों का मेरे ब्लॉग पे बहोत स्वागत है ,आप सबों का स्नेह और आशीर्वाद की उम्मीद अगली रचानों में भी करता हूँ ये सिलसिला हमेशा बना रहे ..

    आभार
    अर्श

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  11. अच्छी रचना
    धन्यवाद.

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  12. अर्श,
    जिस तरह की पोस्टें पढ़ी हैं उसके बाद आज के दिन किसी अलग सी पोस्ट को अच्छा कह पाने का मन ही है।

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  13. बहुत सुंदर कविता.
    धन्यवाद

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  14. अर्श जी...
    बहुत मंजू करीना में आपने ढाला है अपने निदा-ऐ-महफूज को..

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आपका प्रोत्साहन प्रेरणास्त्रोत की तरह है,और ये रचना पसंद आई तो खूब बिलेलान होकर दाद दें...... धन्यवाद ...