Friday, January 2, 2009

ये खुश्बू जरा जानी पहचानी लगी ...

ढूँढने उनको हम जब भी निकले ।
लो दूर तक बस रास्ते ही निकले ॥

फासला बस कदम भर का ही था,
बढ़ा तो गाम फ़िर गाम ही निकले ॥

दर्द में जब आँख से आंसू ना बहे ,
पिछली दफा थे आखिरी निकले ॥

हया ने पूछा जब देखो शरमा के
हया का नाम तो हया ही निकले ॥

उम्र भर मुझको मंजिल ना मिली
मुश्किलों में चलाना यूँ ही निकले ॥

ये खुशबु जरा जानी पहचानी लगी
लगता है "अर्श"इधर से ही निकले ॥

प्रकाश"अर्श"
०२/०१/२००९

21 comments:

  1. अजी ज़रूर मंज़िल मिलेगी, यह सफ़र यूँ ही चलने दो!

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  2. अच्छी बंदिश है अर्श जी...

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  3. बहुत खूब ! नव वर्ष की आप और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं !!!

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  4. ...नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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  5. ये खुशबु.......
    क्या बात है भाई...
    बहुत अच्छा लिखा है

    आज खुशबुओं से भी हमने दिल को तसल्ली दी है

    वो हो न हो उनकी यादों से ही उनकी कमी पुरी की है


    अक्षय-मन

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  6. अति सुंदर....काफिये का दोहराव अधिक है...जरा देख लें...
    नीरज

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  7. खुशबुओं से तसल्ली .......क्या बात है !बहुत सुंदर

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  8. हां खुशबु भी तो जानी पहचानी होती है . बहुत खूब सुंदर

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  9. बहुत ही सुंदर भाव, सुंदर कविता.
    धन्यवाद

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  10. दर्द में आँख से जब आंसू न बहे,
    पिछली दफा थे आखिरी निकले.'

    वाह ! बहुत खूब!
    बहुत ही भाव भरी ग़ज़ल है...
    -अर्श ,आप को और आप के परिवार में सभी को नव -वर्ष की शुभकामनायें.

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  11. abhi ek jagah aap ka yah sher padha..jo aap ne kis aur ke 'do liners ko complete kiya hai'--bahut hi kamaal ka sher ban sakta hai aur ek ghazal bhi!

    जरुरत थी जब किसी अपने की,मैं खुदा को ढूंड लाया..
    वो आशना भी आया जब ना-आशनाको ढूंड लाया

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  12. आप सभी पाठकों को नव वर्ष की ढेरो बधाई और मंगलकामना,साथ में आप सभी का शुक्रिया भी करूँगा जहाँ आप सभी का स्नेह और प्यार परस्पर बना हुआ है ...
    हाँ अल्पना जी वो एक ब्लॉग का छोटा भाई है जिसने मेरे से उस लाइन को पुरा करने के लिए कहा था बस मैंने उसे थोडी से सहायता करी थी,हाँ उससे एक बेहतरीन ग़ज़ल बन सकती है,मगर मिसरा उल तो पुनीत का है सानी सिर्फ़ मेरा है सो मैं चाहूँगा के वही पुरी ग़ज़ल लिखे,अगर हाँ वो मेरी सहायता चाहेगा तो जरुर करूँगा उसकी .....
    आपको भी नव वर्ष की बधाइयाँ .......


    अर्श

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  13. दर्द में आँख से जब आंसू न बहे,
    पिछली दफा थे आखिरी निकले.'
    bahut hi dikash badhai

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  14. सुंदर ग़ज़ल ,
    हर शेर लाज़वाब

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  15. ustaad ji ,kya baat hai , gazal ne to bahut hi badhiya rang jamaya hai . sama baand diya hai aapne to .

    mujhe to gazal likhni nahi aati , aapki gazale padhkar khush ho jaata hoon ji..

    badhai ..

    maine kuch nayi nazmen likhi hai , padhiyenga..

    vijay
    Pls visit my blog for new poems:
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

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  16. Arsh,"page load error" aur apnee kharab sehet ko leke bade dinon baad aapke blogpe aa sakee hun...aur bohot dertak rachnayen padhtee rahee...
    Kin kin panktiyonkaa sandarbh dun ? Mai to aapki rachnayonpe sahee alfaazonme tippanee de paaun, apne aapko is qaabilbhee nahee paatee ! Aap nishabd kar dete hain...!
    Kayee baar aapke blogpe aa chuki hun, par tipaneeke sahee alfaaz na paake khamosh laut gayee hun...
    "Jateeywaad, Aatankwaad tatha antargat Suraksha yantrana", in muddonko leke ek behad abhyaspoorn, interview based par deshwasiyonko jhakjhorke sachhayeese ru-b-ru karanewaalee documentary bananekee koshish me hun...aap abheeka sahbhag aur shubhkamnayen chahti hun...

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  17. बहुत बडिया लिखा है बधाई

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  18. मायूस ना हो दोस्त मेरे कभी कभी यूँ भी हो जाता है ,
    मंजिलोंसे बेहतर हमें उन तक पहुँचने का रास्ता नजर आता है .....
    खुशियोंमे तो शायद हर शख्स भीड़में घिरा नजर आए ,
    मगर मंजिलोंकी तरफ़ बढ़ते वक्त वह अकेला ही नजर आता है ....

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  19. Arsh,
    Aksar aake khaamosh laut jaatee hun...qubool kartee hun ki, aap log jistarahse likhte hain, uskaa sahee bayaan karneke liye mere paas sahee shabd nahee hote....

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