Thursday, August 13, 2009

मां के हाथों की रोटियों की महक ...

लंबे समय के बाद एक छोटी बह' की ग़ज़ल कहने की कोशिश की है जिसे आर्शीवाद परम आदरणीय गूरू देव ने दिया है ... आप सभी के सामने इसे रख रहा हूँ प्यार और आर्शीवाद के लिए...


बह' .... २१२२ १२१२ ११२


मुस्कुराकर वो जब बुलाए मुझे ,
हादसे पास नज़र आए मुझे ॥


मेरा ईमान डगमगाता नहीं ,
कोई कैसे भला झुकाए मुझे

लोग पत्थर मुझे समझते हैं ,
और तुम भी समझ ना पाए मुझे


मां के हाथों की रोटियों की महक ,
शहर से गांव खींच लाए मुझे ॥


उम्र भर की थकन मिटे पल में ,
हंस के वो जब गले लगाए मुझे

तेज रफ़्तार थी बहुत मेरी ,
दर्द ठोकर का ये बताए मुझे ॥


खींच दी है लकीर तुमने जहां ,
इश्क मेरा वहीं बुलाए मुझे


प्रकाश"अर्श"
१३/०८/२००९

Thursday, July 23, 2009

कुछ नहीं है सिवाए यादों के ...

एक तो गर्म मौसम और ऊपर से ये बेवजह की मसरूफियत,बहोत दिनों तक आप सभी से दूर रक्खाइस देरी के लिए आप सभी से मुआफी चाहता हूँ ...पर एक बात है गूरू जी के छड़ी में बहोत आनंद है ... गूरू जी के आर्शीवाद से ये ग़ज़ल आप सभी के सामने पेश करने लायक बन पड़ी ... तो हाज़िर हूँ मैं इस ग़ज़ल को लेकर आप सभी का प्यार और आर्शीवाद के लिए ... मगर पहले ये तस्वीर आदरणीय श्री मुफलिस जी और बड़े भाई श्री नु जी के साथ ... इसे मेरा सौभाग्य ही समझें
आदरणीय श्री मुफलिस जी, मैं , और बड़े भाई मनु जी


बह
'र ..... २१२२ १२१२ २२

दास्तां अपनी क्या कही जाये
बात उसकी ही बस सुनी जाये

कर्ज पर ले तो आए हैं चीजें
किश्त अब किस तरह भरी जाये

जब भी रुखसत करूँ मैं दुनिया से
मेरे संग याद बस तेरी जाये

मैं खुशामद तो कर नही सकता
पर मेरी बात भी सुनी जाये

कुछ नहीं है सिवाए यादों के
आज इनसे ही बात की जाये

ज़िंदगी की फटी हुई चादर
आज फुरसत में बैठ सी जाये॥

'अर्श' ये इश्क भी अजब शै : है
आँख से नींद है उड़ी जाये ॥



और आख़िर में चलते चलते आप सभी को एक ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहता हूँ ... ग़ज़ल गायकी की दुनिया में मैं अपना गूरू उस्ताद गुलाम अली साहब को अपना गूरू मानता हूँ , चूँकि उनको बचपन से ही सुनता रहा हूँ और सुनके ही गज़लें गायी है तो चलिए सुनते है उनकी एक ग़ज़ल के कुछ शे' मेरी आवाज़ में अगर कोई गलती हो गई हो तो मुआफी चाहूँगा आप सभी से .....





प्रकाश'अर्श'
२३/०७/२००९

Wednesday, July 15, 2009

गूरू देव के आश्रम में तरही ...रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ...

तरही चल रही है गूरू देव के आश्रम में ,खूब आनंद से तरही अपनी ऊंचाईओं पे है गूरू जी का आर्शीवाद हम सभी गूरू भाईयों और बहनों को प्राप्त हो रहा है ... साथ में आप सभी का प्यार भी हमें बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करता रहता है ... वेसे मैं तरही में भेजी ग़ज़ल को अपने ब्लॉग पे पोस्ट नही करता मगर ये ग़ज़ल मुझे पसंद है इसलिए आप सभी के सामने लेकर आया हूँ ...वेसे भी ब्लॉग बहोत दिनों से सूना पडा था तो सोचा यही आप सभी के खिदमत में रखूं॥ गूरू देव से क्षमाप्रार्थी हूँ बहोत जगह पे ...

मिसरा-- तरह ... रात भर आवाज देता है कोई उस पार से ...


ज़िंदगी भर पाला पोसा जिसको इतने प्यार से
कर दिया बूढा बता के बेदखल घर बार से

रतजगों का सुर्ख आंखों का सबब बतलायें क्या
रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

इश्क के दरिया को सोचा पार कर लूँ डूब के
डर गया ग़ालिब के कहने भर इसी मझधार से

मेरी धड़कन, मेरी साँसे, मेरी ये तश्नालबी
अब तलक भी दूर है बस एक निगाहे यार से

वो मेरे कहने पे देखो आगया था बाम पर
है ख़बर उसको भी मैं जिन्दा हूँ दीदार से

वो जवानी भूल बैठा चौकसी सीमा पे कर
और हम सोते रहे निर्भय किसी भी वार से

चीखती है अस्मतें और चुप है सारी गोलियां
जनपदों में दर्ज शिकवे रहते है बेकार से

अर्श कातिल कर रहा है मुन्सफी ख़ुद कत्ल का
फैसला पढ़ लेना ये तुम भी किसी अखबार से


प्रकाश 'अर्श '

Thursday, June 18, 2009

इश्क मोहब्बत आवारापन...



इस महीने इतने हादसे हुए कवि जगत पे जिससे मन आहत है मेरे और मेरे परम आदरणीय गूरू जी के तरफ़ से इस अपुरनिया क्षति को तथा उन सभी वरिष्ठ और सम्मानीय दिवंगत कविओं को नम आंखों से श्रधांजलि ॥ आज मेरे इस ब्लॉग का भी एक वर्ष पूरा हो गया है ये मुमकिन सिर्फ़ आप सज्जनों के प्यार, स्नेह और आर्शीवाद से हुआ है , वरना मैं अदना ये सफर कैसे तय कर सकता था, जिसमे मेरे गूरू जी ने मुझे उंगली पकड़ कर चलना सिखाया ॥ ये गूरू शिष्य परम्परा ता-उम्र यूँ ही चलती रहेगी सीखने सिखाने की यही ऊपर वाले से दुआ करूँगा के गूरू जी का आर्शीवाद और आप सभी का प्यार बना रहे ... एक छोटी बह'र की बे-रदीफ़ ग़ज़ल आप सभी के सामने है ,प्यारऔर आर्शीवाद के इंतज़ार में .... आप सभी का "अर्श"




इश्क मोहब्बत आवारापन।
संग हुए जब छूटा बचपन ॥

मैं माँ से जब दूर हुआ तो ,
रोया घर, आँचल और आँगन ॥

शीशे के किरचे बिखरे हैं ,
उसने देखा होगा दर्पण ॥

परदे के पीछे बज-बज कर ,
आमंत्रित करते हैं कंगन ॥

चन्दा ,सूरज ,पर्वत, झरना ,
पावन पावन पावन पावन ॥

बिकता हुस्न है बाज़ारों में ,
प्यार मिले है दामन दामन ॥

कौन कहे बिगडे संगत से ,
देता सर्प को खुश्बू चंदन ॥

दुनिया उसको रब कहती है ,
मैं कहता हूँ उसको साजन॥



प्रकाश "अर्श"
१८/०६/२००९

Friday, May 29, 2009

यूँ हस्ती मिटा कर ....

गूरू जी के आर्शीवाद से छोटी बह'र की एक और ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ... आप सभी का प्यार और आर्शीवाद चाहूंगा...

बह'र - १२२ १२२

फ़ऊलुन फ़ऊलुन



मैं खुश हूँ उड़ा कर ।
यूँ हस्ती मिटा कर ॥

ये कैसे कहूँ मैं ,
हूँ जिंदा भुला कर ॥

वो आया नहीं क्यों ,
बता दो पता कर ॥

सुना फैसला अब ,
तू हां कर या ना कर ॥

मुझे उसने लूटा ,
पड़ोसी मिला कर ॥

लिखा है ये माँ ने ,
तू आजा खुदा कर

दुआ ज़िन्दगी की ,
हलाहल पिला कर ॥

वो बदनामी को भी ,
गया ले भुना कर ॥

करे अर्श अब क्या ,
वो बैठा है आ कर ॥


प्रकाश"अर्श"

Friday, May 22, 2009

थके - थके से कदम ...






हाँ
जब भी
मैं अपने थके - थके से कदम ,
घुटती साँसे,
और
टूटती धड़कनों ,
की
तरफ़ बोझिल आंखों से ,
देखता हूँ,
तो ये
चमकती आंखों से
कहती है
सब
के
सब
हम तो नही ठहरे
फ़िर तुम क्यूँ ?




Thursday, May 7, 2009

ये मनाने का हुनर हो शायद ...

गूरू देव ने इसे छू लिया और ये कहने लायक बन पडी है आप सभी का आर्शीवाद भी चाहूँगा ...

बहरे रमल मुसद्दस मखबून मुसक्कन
( २१२२ ११२२ २२ )


मेरा भी दिल-ओ- ज़िगर हो शायद ।
उसको भी इसकी ख़बर हो शायद ॥

रास्ते दे रहे आवाज़ मुझे ।
मेरी किस्मत में सफर हो शायद ॥

दूर जाकर के वो बैठा मुझसे ।
ये मनाने का हुनर हो शायद ॥

बस्तियों को जो जला कर खुश है ।
उनका भी इक कहीं घर हो शायद॥

मैं फकीरों की तरह फिरता हूँ ।
उनपे अल्लाह की मेहर हो शायद ॥

'अर्श' रहता है अंधेरों में अब ।
क्या पता कल न सहर हो शायद ॥


प्रकाश"अर्श"
०७/०५/२००९

Friday, May 1, 2009

वो कातिल अदा उफ़ ...

लगातार बड़ी बहर पे लिखने के बाद एक छोटी बहर की ग़ज़ल आप सभी के सामने लेकर आया हूँ आर्शीवाद गूरू देव का है, आप सभी का भी स्नेह और आर्शीवाद चाहूँगा ....


बहर .... १२२ १२२
फ़ऊलुन फ़ऊलुन


वो कातिल अदा उफ़
वो हुस्न-ऐ शबा उफ़ ॥

हैं दीवाने हम पर
हां तेरी वफ़ा उफ़ ॥

है दिल हारने में
लो नुक्सा नफ़ा उफ़ ॥

वो आदाब में भी
नजाकत है क्या उफ़ ॥

लगी भीड़ कैसी
है क्या माजरा उफ़ ॥

वो जां लेके बोले
तुम्हे क्या हुआ उफ़ ॥

चले उसको छूकर
ये आबो हवा उफ़ ॥

दबे लब से कहना
वो है'अर्श'का उफ़ ॥

प्रकाश"अर्श"
०१/०५/२००९

Tuesday, April 21, 2009

मां सबसे है पहले मिरी लिल्लाह खुदाओं में...

माँ की दिली पुकार ने इस ग़ज़ल को जन्म दिया और इसे कहने लायक परम आदरणीय गूरू देव ने बनाया ... आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहता हूँ ....

बहर - २२१ १२२१ १२२१ २१२
मफऊलु मुफाईलु मुफाईलु फाएलुन



इतना तो असर है मेरी माँ की दुआओं में ।
टूटा हुआ पत्ता भी बसे है फिजाओं में ॥

बादल भी था बिजली भी थी तूफां भी तेज था ।
आंचल ने बचाए मुझे रक्खा घटाओं में ॥

आंखों से हूँ ओझल ओ' बड़ी दूर हूँ मगर ।
दे जाती है ममता मुझे अम्मा हवाओं में ॥

देती न सलीका जो वो चलने का धूप में
कैसे मैं भला बैठ यूँ पाता क़बाओं में ॥

देखा नही रोते हुए दुख में कभी उसे ।
हां आंखें छलकती है खुशी की सदाओं में ॥

वो पूजते पत्थर है मैं इंसान पूजता हूँ
मां सबसे है पहले मिरी लिल्लाह खुदाओं में ॥

हर मर्ज को हाथों से मां छूकर भगाए ज्यों ।
तासीर मिली अर्श को कब वो दवाओं में ॥

प्रकाश'अर्श"
२१/०४/२००९

Tuesday, April 14, 2009

मेरे सिरहाने उड़नतस्तरी ...

हर सुबह की तरह आज की सुबह नही थी अगर ऐसा कहूँ तो कोई आश्चर्य की बात ना होगी.हालाकि सुबह तो आज भी हुई थी हर रोज अपने माता पिता को नमन कर बिस्तर त्यागता था मगर आज बिस्तर त्याग ही नही पाया कारण ये था के जैसे ही मेरी आँख खुली मेरे सिरहाने एक कुरियर था ,उन्धियाते आंख से देखा तो मेरे नाम से ही था मगर निचे छोटे अक्षरों में एक नाम था जो ब्लॉग जगत में उड़नतस्तरी के नाम से हर ओर जगमाता रहता है और वो नाम था प्रसिद्ध ब्य्न्ग्कार हास्य लेखक और मेरे बड़े भाई श्री समीर लाल जी का।

घोर आश्चर्य प्रफूलित और अपने आप पे गर्व महसूस कर रहा था मैं दिल ही दिल उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दे रहा था । और एक और सुबह जो जिंदगी में कभी ना भूल पाने वाली हो गई क्युनके मैं हमेशा कहता हूँ के हर दिन नही भूल पाने वाला दिन हो ये मुमकिन नही होता।और ये आज का दिन बड़े भाई के नाम कर दिया मैंने भी . हो सकता है इस पुस्तक को सबसे पहले पाने वाला शायद मैं बन गया जैसी की मेरी दिली खाहिश थी।
बस बिस्तर पे बैठे बैठे ही इस पुस्तक को पढ़ना शुरू कर दिया,जितने दिल के धनी वो है उसके क्या कहने पुस्तक को समर्पित किया है आपने माँ को मैं ये सवाल करता हूँ उनसे के ये सभी माये देखने में एक जैसी क्यूँ होती है ?
मैंने कभी उन्हें देखा नही मगर मेरा नमन है उनको।
माँ के तस्वीर के निचे बिखरे हुए पाँच मोती है क्रमशः गीत ,छंद मुक्तक कविताएं ,ग़ज़ल, मुक्तक और फ़िर क्षणिकाएं क्रमागत रूप से जैसे पुरी तरीके से माँ को समर्पित। इस भावविशेष पे उन्हें बधाई ॥
मैं पांचो को थोड़ा थोड़ा करके बताऊंगा ...
कल तक लोग सामील लाल जी के हास्य स्वरुप को देखा होगा और ख़ुद मैं भी उनके इसी स्वरुप से परिचित था मगर वो इस तरह के गंभीर विषय पे लिख सकते है या ये गंभीर स्वरुप भी उनका है ये समझ नही पाया था !!! चलिए मिलते है उनके कई स्वरुप से ..
गीत :- अपनी माता जी को समर्पित इस गीत के बारे में क्या कहने
सूरज क्यूँ इतना तपता है
मेरा अंग अंग जलता है
पहले सा सूरज लगता है
पर कितनी तेज चमकता है
मेरी चाट जाने कहाँ गई
छाँव पाने को दिल मचलता है
माँ ! तू जबसे दूजे जहाँ गई
ये घर बिन चाट का लगता है
माँ के बारे में इतनी गंभीर बात अगर कोई लिख सकता है तो उसके बारे में हास्य की अवधारण सिरे से खारिज हो जाती है स्वतः ही । बस ये कहूँ के मशहूर शईर जनाब मुनव्वर राणा साहिब के बाद समीर जी को ही पढा इस तरह से माँ पेइस कविता के लिए उनके लेखनी को सलाम

छंद मुक्तक कवितायें :- जरा इस गहरी और अप्रतिम सोच को पढ़े और कहें की क्या ये समीर लाल जी ने ही लिखी है ??? तो मैं कहता हूँ जरा मजाकिए किस्म के इंसान के इस गहरी सोच का क्या कोई अंदाजा लगा पायेगा। जो आपनी सरल भाषा शैली जो मूलतः बोल चाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है मानस पटल पे इतनी गहरी छाप छोडेगी ...... ।
१. दालान से नीचे उतरती
दो सीढियों के
सिल के बीच से
उग आई
कहती है मुझसे
हमें अपनी स्पेस
बनाना आता है
मुझे अवाक देख
दीवार पर लगी काई
मेरी पतनशील सोच को
मुंह चिढा रही है...

२ साहिल पे बैठा
वो जो डूबने से बचने की
सलाह देता है
उसे तैरना नही आता
वरना
बचा सकता था ...

धन्य हुआ मैं तो इस तरह पे सोच को पढ़ के कमाल कर दिया है समीर लाल जी ने॥
अब चलते है ग़ज़ल की ओर जो मेरा सबसे पसंदीदा साहित्यिक भाग है या ये कहूँ के मेरे रगों में बसी है तो ग़लत ना होगा मगर इस पहचानने वाले मेरे गूरू श्री पंकज सुबीर जी है तो इसे निरंतर निखारने में लगे है ॥मगर अभी बात करते है समीर लाल जी के ग़ज़ल लेखन की.........
ग़ज़ल:-
देखता हूँ बैठ कर मैं इस चिता पर कब्रगाह
छोड़ दो इस बात को,ये मजहबी हो जायेगी
समाज में धर्म के नाम पर जो दंगे फसाद हो रहे है और जो आतंक देखने में आ रहा है क्या ये शे'र मुकम्मल तरीके से प्रर्दशित नही कर रहा है इस शेर पे आज के जाने माने ग़ज़लों में खासा दखलंदाजी रखने वाले डाक्टर कुवंर बेचैन साहिब ने उनकी पीठ थपथपाई है, किसके मुंह से इस शे'र पे वाह वाह नही निकलेगी... ये इंसान इंतनी गहरी बात को इतनी आसानी से लिख लेगा हतप्रभ हूँ मगर कोई शक नही॥

एक और शे'र लिखने से अपने आपको रोक ना सका॥

फ़ैल कर के सो सकूँ इतनी जगह मिलती नही
ठण्ड का बस नाम लेकर,मैं सिकुड़ता रह गया
क्या ये शे'र गहरे भावबोध का परिचय नही करा रही है मानसपटल पर...

और छोटे बहर के ये दो शे'र ....

मौत से दिल्लगी हो गई
ज़िन्दगी अजनबी हो गई

साँस गिरवी है हर इक घड़ी
कैसी ये बेबसी हो गई ॥

जैसा की मेरे गूरू देव कहते है के छोटे बहर पे लिखना जितना आसान दीखता है उतना होता नही क्युनके आपको कम शब्द में पुरा का पुरा कथ्य को सम्पूर्ण करना होता है ,इस बात पे समीर जी के क्या कहने छोटी बहर के उस्ताद शाईर ....

मुक्तक:-
सिर्फ़ एक मुक्तक ने मेरा दिल लूट लिया .....
नज़र पड़ती है धरती पर,वहाँ तारे भी रोते है
असर है खौफ का ऐसा खुली आँखों ही सोते है
सजगा जब तलक होगी,ज़रा हम चैन पा लेंगे
अधिकतर चुक के किस्से,बड़े शहरों में होते है॥

कितने खुले विचार को शब्द बोध में बाँध कर के रखा है समीर लाल जी ने ॥

क्षणिकाएं:-
एक गरीब और बेचारी मान को देखिये कैसे बच्चे को जीना सिखाती है...

रोटी के लिए
बच्चे की जिद
और वो बेबस लाचार माँ
उसे मारती है,
वो जानती है भूख का दर्द
मार के दर्द में
कहीं खो जायेगा
कुछ देर को ही सही
बच्चा रोते रोते
सो जायेगा
एक और समसामयीक पे क्षणिका इसके बाद आपको भी पता लग जायेगा के समीर लाल जी कितने ठोस ब्यंग्कार है ...

ऊँचे अंक लाने के बाद भी
वो प्रतिक्षा सूचि में
खडा है...
आरक्षण का तमाचा
सीधा उसके गाल पर
पडा है....

देखिये इस लेख और रचना को कितनी गंभीरता लिए हुए है ...

बस यही कहूँगा के कौन कहता है के ये बिखरे मोती है, मैं तो कहता हूँ के ये तो मोतिओं से भरी हुई और सजी हुई माला है जिसके सारे के सारे मोतियाँ मुकम्मल है...आख़िर में मैं समीर लाल जी और अपने बड़े भाई को दिल इस पुस्तक के लिए दिल से बधाई और ढेरो शुभकामनाएं देता हूँ और इसकी असीम सफलता की कामनाएं करता हूँ... साथ में शिवना प्रकाशन का भी आभार....

पुस्तक प्राप्ति :-
मूल्य मात्र रु २००/-
प्रकाशक; शिवना प्रकाशन
पी सी लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड के सामने, सीहोर,
मध्यप्रदेश ४६६००१ भारत ॥
दूरभाष: ९१-९९७७८५५३९९

प्रकाश"अर्श"
१४/०४/२००९

Saturday, April 11, 2009

कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ...

परम श्रधेय गूरू देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल कुछ कहने लायक बनी है आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा...


बहरे-हजज मुसमन सालिम (१२२२*)


हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए ।
के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए ॥

हिकारत से यूँ रस्ते में मुझे जालिम ना देखा कर
मुहब्बत इस कदर ना कर कोई मगरूर हो जाए ॥

जली होंगी कई लाशें दफ़न होंगे कई किस्से
संभलना शहर फ़िर कोई ना भागलपूर हो जाए ॥

कोई शिकवा हो तो कह दे इसे ना दिल में रक्खा कर
ज़रा सा जख्म है बढ़कर न ये नासूर हो जाए ॥

जिसे भी देखिये वो बेदिली से देखता है अब
मुहब्बत करने वालों का न ये दस्तूर हो जाए ॥

वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ॥

है पीना कुफ्र ये जो"अर्श"से कहता रहा कल तक
वही प्याला लबों को दे तो फ़िर मंजूर हो जाए ॥

प्रकाश"अर्श"
११/०४/२००९

Monday, March 30, 2009

मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ...

परम आदरणीय और मेरे गूरू वर श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए प्रतीक्षारत ....


हाय वो वक्त किस कदर होगा
मेरा महबूब मेरे घर होगा ।

दिल हमारा है प्रेम का मन्दिर,
हम पे नफ़रत का ना असर होगा ।

घर बनाते है पत्थरों के सब
मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ।

उनसे जब सामना होगा मेरा
दिल मेरा आसमान पर होगा ।

दिल को छलनी किया है नज़रों ने
इस पे कब मरहमे नज़र होगा ।

आज फ़िर ज़िन्दगी बुलाती है
आज फ़िर से शुरू सफर होगा ।

उनसे नज़रें मिलाये बैठा है
अर्श को मौत का ना डर होगा ॥


बहर .... २१२२ १२१२ २२
प्रकाश'अर्श'
३०/०३/२००९

Sunday, March 22, 2009

तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ...

परम आदरणीय श्री प्राण शर्मा जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए....


तेरा चेहरा मुझे अच्छा लगे है ।
तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ॥

मेरी किस्मत कहाँ मुझको मिले तू
तुझे पा लू मुझे किस्सा लगे है ॥

तुम्हारी बात में ऐसा असर है
ये मिट के भी मुझे पुख्ता लगे है ॥

मेरी किस्मत में चलना ही है यारो
मेरी मंजिल मुझे रस्ता लगे है ॥

तुम उससे पूछते हो दोस्तो क्या
कि वो हर बात में बच्चा लगे है ॥

भुला पाउँगा इसको'अर्श' कैसे
तुम्हारा प्यार नित सच्चा लगे है ॥

बहर १२२२ १२२२ १२२
प्रकाश'अर्श'
२२/०३/२००९

Sunday, March 15, 2009

साहित्य ,ज्ञानपीठ और गुरु देव....

कुछ बात है के हस्ती मिटती नही हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरें जहाँ हमारा

शनिवार की सुबह ऐसे तो 11 बजे से पहले मेरी आँख नही खुलती कभी मगर आज का ये दिवस जैसे मेरे पुरे जीवन के लिए नही भूल सकने और मिटने वाला है । हमेशा से ही ये सोचता था के हर दिन ऐसा हो के हमेशा के लिए याद रह जाए मगर ये मूलतः सम्भव नही है ,हर एक के लिए उसके जीवन में ।
मुझे इस बात का जारा सा भी इल्म नही था के साहित्य ,हिन्दी भवन ,और मेरे गुरु जी एक साथ ही मुझे मिलेंगे। जैसे ही मैं हिन्दी भवन पहुँचा गुरु जी पहले ही पहुँच चुके थे समय पे जैसे ही मैंने उनका चेहरा पहली दफा देखा धन्यभाग मेंरे कितनी सहजता से उन्होंने मुझे गले लगने पे बिवश किया मेरे चरण छूने पे ,पता नही ये कैसी तस्कीन थी उनसे गले लग के एक अलग सी शान्ति और सुकून मिला जो पहले कभी भी एहसास नही हुआ

जब गुरु जी को नवलेखन के लिए सभागार के सबसे अगली पंक्ति में बैठने को
कहा गया तो मैं ह्रदय से प्रफुल्लित और भाव बिभोर हो उठा इस बात का सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है के भारत जैसे विशाल देश में एक छोटे से कसबे सीहोर का वो शांत मृदुल और विनम्र स्वाभाव का ब्यक्ति साहित्य जगत में आज सबसे पहली पंक्ति में बैठा है । शायद इस बात का अंदेशा उन्हें भी नही था ।जो मंच पे या खचाखच भरे सभागार में बैठे हजारो लोग थे ।

मंच पे साहित्य जगत के बड़े-बड़े हस्ताक्षातर श्री कुंवर नारायण ,अजित कुमार, अशोक वाजपयी, श्री कैलाश वाजपयी,और सुश्री रिता शुक्रल जी आसीन थे । वो गर्व महसूस कर रहे होंगे के उनके सामने ये सरल स्वाभाव का इंसान जो बैठा है उतराधिकारी के रूप में है, उसके हाथ में हिन्दी जगत का भविष्य बहोत उज्जवल है और सुरक्षित भी ।

ईस्ट इंडिया कंपनी १५ छोटी छोटी कहानियो का संकलन है । जिसमे सारे के सारे मोतिओं के समान कहानियाँ है को गुरु जी ने पिरोया है हमारे लिए ।
साहित्य जगत में अमिट दखल रखने वाली सुश्री रिता शुक्ला जी औरज्ञानपीठ के निदेशक श्री रविन्द्र कालिया जी ने पुस्तक का विमोचन किया ऐसा लग रहा था के जैसे माँ
सरस्वती ख़ुद धारा पे आई है और उतराधिकारी को उसका राज तिलक कर रही है ,मुख्या मंत्री साहिबा थोडी देर थी तो एक बात सबको ध्यान रहे समय किसी का इंतज़ार नही करता ,हालाकिं वो आई मगर अफ़सोस जाहिर करने के सिवा उनके पास कुछ भी नही था ।आप सभी तो राजनीति, मसरूफियत देर से आना ये सारे एक ही घडे के पानी पिने के समान है समझ सकते है

पुस्तक विमोचन के बाद हम श्री कुंवर नारायण जी मिले और उनका आशीर्वाद लिया । साहित्य जगत और साहित्य से मेरी मुलाक़ात ये मेरी ज़िन्दगी में पहली दफा है रही थी, मैं उत्सुक था,सभी से मिलने केलिए ख़ुद गुरु वर मुझे नए और पुराने लेखको से मेरा परिचय करा रहे थे "अर्श" के रूप में ।

वहां से हम केन्नोट पैलेस में लंच लेने के लिए वही पे गुरु जी से विस्तार से बात होती रही डाईनिंग टेबल पे । फ़िर होटल गए वहां खूब गप्पे मारे , गुरु जी से सीखता रहा उनके आशीर्वचन सुनता रहा लेख और लेखनी के बा
रे में ।
शाम को थोड़ा घुमाने गए । घुमाते घूमते एक होटल में अल्पाहार लेने गए ,एक और बात है गुरु जी के सेहत से आप ये बात बिल्कुल नही कह सकते के ये इंसान खाने का खूब शौकीन है मगर सिर्फ़ शौक रखते है खाते नही

लौटने के बात देर रात तक होटल में बात चलती रही उनके साथ सोनू जी भी आए थे उनसे से भी मुलाक़ात हुई
फ़िर रात्रि १२ बजे मैं वापिस आगया ताकि सुबह वाली ट्रेन में जानी है इन दोनों लोगों को तो थोड़ा आराम का भी मौका मिले कल से है इन्हे सब तो नसीब था मगर आराम नही कर पा रहे थे मेरे मिलने से और कहूँ तो उत्सुकता से मिलने को लेकर॥
गुरु जी की पहली पुस्तक को सबसे पहले खरीदने का गौरव भी मुझे प्राप्त हुआ उनके हस्ताक्षर सहित और एक और लेखक श्री रविकांत जी की पुस्तक यात्रा को भी सबसे पहले मैंने ही ख़रीदा ॥
पुस्तक प्राप्ति का पता है १८, इन्स्तितुशनल एरिया ,लोदी रोड नई दिल्ली -११०००३
मूल्य मात्र रु .१३०/-
बस एक शे' है के ...
वो मिले बिछड़ भी गए और चुप हो रहे
जैसे मुख्तशर सी बात में सदियाँ गुजर गयी

प्रकाश'अर्श'
१५/०३/२००९