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Friday, May 29, 2009

यूँ हस्ती मिटा कर ....

गूरू जी के आर्शीवाद से छोटी बह'र की एक और ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ... आप सभी का प्यार और आर्शीवाद चाहूंगा...

बह'र - १२२ १२२

फ़ऊलुन फ़ऊलुन



मैं खुश हूँ उड़ा कर ।
यूँ हस्ती मिटा कर ॥

ये कैसे कहूँ मैं ,
हूँ जिंदा भुला कर ॥

वो आया नहीं क्यों ,
बता दो पता कर ॥

सुना फैसला अब ,
तू हां कर या ना कर ॥

मुझे उसने लूटा ,
पड़ोसी मिला कर ॥

लिखा है ये माँ ने ,
तू आजा खुदा कर ॥

दुआ ज़िन्दगी की ,
हलाहल पिला कर ॥

वो बदनामी को भी ,
गया ले भुना कर ॥

करे अर्श अब क्या ,
वो बैठा है आ कर ॥


प्रकाश"अर्श"

Friday, May 22, 2009

थके - थके से कदम ...






हाँ
जब भी
मैं अपने थके - थके से कदम ,
घुटती साँसे,
और
टूटती धड़कनों ,
की
तरफ़ बोझिल आंखों से ,
देखता हूँ,
तो ये
चमकती आंखों से
कहती है
सब
के
सब
हम तो नही ठहरे
फ़िर तुम क्यूँ ?




Thursday, May 7, 2009

ये मनाने का हुनर हो शायद ...

गूरू देव ने इसे छू लिया और ये कहने लायक बन पडी है आप सभी का आर्शीवाद भी चाहूँगा ...

बहरे रमल मुसद्दस मखबून मुसक्कन
( २१२२ ११२२ २२ )


मेरा भी दिल-ओ- ज़िगर हो शायद ।
उसको भी इसकी ख़बर हो शायद ॥

रास्ते दे रहे आवाज़ मुझे ।
मेरी किस्मत में सफर हो शायद ॥

दूर जाकर के वो बैठा मुझसे ।
ये मनाने का हुनर हो शायद ॥

बस्तियों को जो जला कर खुश है ।
उनका भी इक कहीं घर हो शायद॥

मैं फकीरों की तरह फिरता हूँ ।
उनपे अल्लाह की मेहर हो शायद ॥

'अर्श' रहता है अंधेरों में अब ।
क्या पता कल न सहर हो शायद ॥


प्रकाश"अर्श"
०७/०५/२००९

Friday, May 1, 2009

वो कातिल अदा उफ़ ...

लगातार बड़ी बहर पे लिखने के बाद एक छोटी बहर की ग़ज़ल आप सभी के सामने लेकर आया हूँ आर्शीवाद गूरू देव का है, आप सभी का भी स्नेह और आर्शीवाद चाहूँगा ....


बहर .... १२२ १२२
फ़ऊलुन फ़ऊलुन


वो कातिल अदा उफ़
वो हुस्न-ऐ शबा उफ़ ॥

हैं दीवाने हम पर
हां तेरी वफ़ा उफ़ ॥

है दिल हारने में
लो नुक्सा नफ़ा उफ़ ॥

वो आदाब में भी
नजाकत है क्या उफ़ ॥

लगी भीड़ कैसी
है क्या माजरा उफ़ ॥

वो जां लेके बोले
तुम्हे क्या हुआ उफ़ ॥

चले उसको छूकर
ये आबो हवा उफ़ ॥

दबे लब से कहना
वो है'अर्श'का उफ़ ॥

प्रकाश"अर्श"
०१/०५/२००९

Tuesday, April 21, 2009

मां सबसे है पहले मिरी लिल्लाह खुदाओं में...

माँ की दिली पुकार ने इस ग़ज़ल को जन्म दिया और इसे कहने लायक परम आदरणीय गूरू देव ने बनाया ... आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहता हूँ ....

बहर - २२१ १२२१ १२२१ २१२
मफऊलु मुफाईलु मुफाईलु फाएलुन



इतना तो असर है मेरी माँ की दुआओं में ।
टूटा हुआ पत्ता भी बसे है फिजाओं में ॥

बादल भी था बिजली भी थी तूफां भी तेज था ।
आंचल ने बचाए मुझे रक्खा घटाओं में ॥

आंखों से हूँ ओझल ओ' बड़ी दूर हूँ मगर ।
दे जाती है ममता मुझे अम्मा हवाओं में ॥

देती न सलीका जो वो चलने का धूप में
कैसे मैं भला बैठ यूँ पाता क़बाओं में ॥

देखा नही रोते हुए दुख में कभी उसे ।
हां आंखें छलकती है खुशी की सदाओं में ॥

वो पूजते पत्थर है मैं इंसान पूजता हूँ
मां सबसे है पहले मिरी लिल्लाह खुदाओं में ॥

हर मर्ज को हाथों से मां छूकर भगाए ज्यों ।
तासीर मिली अर्श को कब वो दवाओं में ॥

प्रकाश'अर्श"
२१/०४/२००९

Saturday, April 11, 2009

कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ...

परम श्रधेय गूरू देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल कुछ कहने लायक बनी है आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा...


बहरे-हजज मुसमन सालिम (१२२२*४)


हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए ।
के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए ॥

हिकारत से यूँ रस्ते में मुझे जालिम ना देखा कर
मुहब्बत इस कदर ना कर कोई मगरूर हो जाए ॥

जली होंगी कई लाशें दफ़न होंगे कई किस्से
संभलना शहर फ़िर कोई ना भागलपूर हो जाए ॥

कोई शिकवा हो तो कह दे इसे ना दिल में रक्खा कर
ज़रा सा जख्म है बढ़कर न ये नासूर हो जाए ॥

जिसे भी देखिये वो बेदिली से देखता है अब
मुहब्बत करने वालों का न ये दस्तूर हो जाए ॥

वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ॥

है पीना कुफ्र ये जो"अर्श"से कहता रहा कल तक
वही प्याला लबों को दे तो फ़िर मंजूर हो जाए ॥

प्रकाश"अर्श"
११/०४/२००९

Monday, March 30, 2009

मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ...

परम आदरणीय और मेरे गूरू वर श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए प्रतीक्षारत ....


हाय वो वक्त किस कदर होगा
मेरा महबूब मेरे घर होगा ।

दिल हमारा है प्रेम का मन्दिर,
हम पे नफ़रत का ना असर होगा ।

घर बनाते है पत्थरों के सब
मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ।

उनसे जब सामना होगा मेरा
दिल मेरा आसमान पर होगा ।

दिल को छलनी किया है नज़रों ने
इस पे कब मरहमे नज़र होगा ।

आज फ़िर ज़िन्दगी बुलाती है
आज फ़िर से शुरू सफर होगा ।

उनसे नज़रें मिलाये बैठा है
अर्श को मौत का ना डर होगा ॥


बहर .... २१२२ १२१२ २२
प्रकाश'अर्श'
३०/०३/२००९

Sunday, March 22, 2009

तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ...

परम आदरणीय श्री प्राण शर्मा जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए....


तेरा चेहरा मुझे अच्छा लगे है ।
तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ॥

मेरी किस्मत कहाँ मुझको मिले तू
तुझे पा लू मुझे किस्सा लगे है ॥

तुम्हारी बात में ऐसा असर है
ये मिट के भी मुझे पुख्ता लगे है ॥

मेरी किस्मत में चलना ही है यारो
मेरी मंजिल मुझे रस्ता लगे है ॥

तुम उससे पूछते हो दोस्तो क्या
कि वो हर बात में बच्चा लगे है ॥

भुला पाउँगा इसको'अर्श' कैसे
तुम्हारा प्यार नित सच्चा लगे है ॥

बहर १२२२ १२२२ १२२
प्रकाश'अर्श'
२२/०३/२००९

Thursday, March 5, 2009

आंखें दो काली ऐसे थीं मशहूर शहर में ...

परम श्रधेय गुरु देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल ,आप सबके सामने प्रस्तुत है ,आप सभीका प्यार और आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ.... आप सभी को होली की अनंत -असीम शुभकामनाएं सहित ....

बहर ... २२१ २१२१ १२२१ २१२


भरती रही वो सिसकियां देखा कोई न था ।
किस चाल से चला के ज्‍युं आया कोई न था ॥

किस मौज से खड़ा हुआ खंडहर है देखिये ।
कैसे कहूं के दिल यहां टूटा कोई न था ॥

आंखें दो काली ऐसे थीं मशहूर शहर में ।
दोनों जहां में जैसे के दूजा कोर्इ न था ॥

देता रहा वो धूप में छाया गुलों से ही ।
उस पेड़ में पलाश के पत्‍ता कोई न था ॥

मुझको तसल्लियां तो मिलीं सबसे'अर्श' पर ।
देखा पलट के जब भी तो अपना कोई न था ॥


प्रकाश'अर्श'
०५/०३/२००८

Saturday, February 28, 2009

अदब से मौत का भी सामना करे कोई ...

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी
के सामने है ... आप सभी के प्यार औरआशीर्वाद का आकांक्षी हूँ ....



ये मुख्‍़तसर सी जि़ंदगी है क्‍या करे कोई ।
है सांस आखिरी बची दुआ करे कोई ॥

घुटन है जिन्‍दगी ये फिर भी जी रहा हूं मैं ।
क्‍युं आखिरी में बात बेमजा करे कोई ॥

मिले हैं मौत से तो झूम कर के हम गले ।
बला से अपने जिन्‍दगी कहा करे कोई ॥

यकीन है वो आयेगा जरूर लौट कर ।
उसीके इन्‍तजार में जिया करे कोई ॥

कला तो सीखते हैं जिन्‍दगी की सब यहां ।
अदब से मौत का भी सामना करे कोई ॥

किसे रहे थे अर्श ढूंढ ख्‍वाब में भला ।
ये नींद टूटने पे क्‍या पता करे कोई ॥

प्रकाश'अर्श'
२९/०२/२००९


Thursday, February 19, 2009

नहीं के हमको निभाना नही आता ...

गुरु जी के आशीर्वाद के इंतज़ार में......



नहीं के हमको निभाना नहीं आता ॥
वक्त पे उनको भी आना नहीं आता ॥

जरा सी बात पे देखो वो रूठ जाते है ,
क्या कहूँ उनको सताना नही आता ॥

रस्म तो रस्म है क्यूँ घबरा रहे हो तुम ,
क्या तुम्हे रस्म निभाना नही आता .?

अभी तो आए हो जी-भर के देख तो लूँ
तुम्हे न जाने का बहाना नही आता ॥

आज का दौर है दिखावे का सुनो तुम ,
तू रह जाएगा गर दिखाना नही आता ॥

तू कहे 'अर्श'तेरे कुचे में दम निकले ,
बस ये है तुझे आजमाना नहीं आता ॥

प्रकाश'अर्श"
१९/०२/२००९

Thursday, January 15, 2009

ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ...

बहरे खफीफ ..............................................आशीर्वाद
२१२२-१२१२-२२....................................गुरु देव पंकज सुबीर जी

मैंने भी दिल लगा लिया यारों।
जख्म पे जख्म पा लिया यारों ॥

मौज फ़िर ज़िन्दगी नही देती ।
जख्म गहरा जो ना लिया यारों ॥

आज ना डगमगा के चल पाया ।
वादा बादे पे था लिया यारों ॥

हादसे और हो गए होते ।
ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ॥

दफ्न कर 'अर्श'लौट जाओ तुम।
रूह तो और जा लिया यारों ॥

प्रकाश'अर्श'
१५/०१/२००९
बादे=शराब ,जा=जगह ।

Sunday, January 11, 2009

रे मर जाएगा क्यूँ सोचे है ...

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल ...

कल क्या होगा,क्यूँ सोचे है
मर जाएगा, क्यूँ सोचे है ॥

खुद को तक, गिरवी रक्‍खा है
बिक जाएगा ,क्यूँ सोचे है ॥

अपना घर कितना अपना है
वो आएगा ,क्यूँ सोचे है ॥

शेर नहीं दिल, के छाले हैं
वो समझेगा ,क्यूँ सोचे है ॥

बीत गया जो, रीत गया जो
फ़िर लौटेगा ,क्यूँ सोचे है ॥

अर्श है बेबस ,इस दुनिया में
पछतायेगा , क्यूँ सोचे है ॥

प्रकाश"अर्श"
११/०१/२००९

Saturday, January 10, 2009

जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था...

उसको मेरी मोहब्बत का एतबार न था ।
मैं लौट आऊंगा उसे मिरा इंतज़ार न था॥

वो लौट आई है शहर में मोहब्बत लेकर
बचपन का प्यार शायद यादगार न था ॥

लिखती थी हथेली पे वो इक नाम हमेशा
देखा तो नाम मिरा वो गमगुसार न था ॥

पूछता रहा मैं हाल उसका औरों के हवाले
जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था॥

आया है वो भी देख लो चार अश्क बहा के
जिस मजार पे गया था वहां अश्कबार न था॥

आया हूँ कहीं और या हूँ अपने शहर में
पहले तो बागबां"अर्श"यूँ बे-बहार न था ॥

प्रकाश"अर्श"
१०/०१/२००९

Tuesday, January 6, 2009

आप ही कन्धा आप ही जनाजा ...

पुरानी रंजिश को हवा दीजे ।
फ़िर वही सूरत दिखा दीजे ॥

आज मजबूर-ऐ हालात दिल है
मर ही जाने का हौसला दीजे ॥

हाथ में चार पैसे है बचे अब
ना कहना चाँद-तारे ला दीजे ॥

मैं ग़लत हूँ मुजरिम हूँ अगर
मुझको फंदे पे लटका दीजे ॥

आखिरी ख्वाहिश भी छुपा लूँगा
आप जल्दी से दफना दीजे ॥

आप ही कन्धा आप ही जनाजा
"अर्श"कब्र का रास्ता दिखा दीजे॥


प्रकाश"अर्श"
०६/०१/२००९
आप =मैं ख़ुद ,

Sunday, January 4, 2009

सामने खड़ा है फासला है ये ...

एक बड़ा अच्छा वाकया है ये ।
वो ना समझे है क्या नया है ये ?

हम मोहब्बत में हो गए जुदा ।
लोग कहते इसे कायदा है ये ॥

देख सरगोशी है मोहल्ले में
है मिली उनको जायका है ये ॥

बह रही मुझमे वो लहू बनके
वो मेरी है बस माज़रा है ये ॥

उम्र के जैसी लम्बी हुई दूरी
सामने खड़ा है फासला है ये ॥

लोग कहते है बेवफा है"अर्श"
मैं अगर मानु तो बा-वफ़ा है ये॥

प्रकाश"अर्श"
०४/०१/२००९

Friday, January 2, 2009

ये खुश्बू जरा जानी पहचानी लगी ...

ढूँढने उनको हम जब भी निकले ।
लो दूर तक बस रास्ते ही निकले ॥

फासला बस कदम भर का ही था,
बढ़ा तो गाम फ़िर गाम ही निकले ॥

दर्द में जब आँख से आंसू ना बहे ,
पिछली दफा थे आखिरी निकले ॥

हया ने पूछा जब देखो शरमा के
हया का नाम तो हया ही निकले ॥

उम्र भर मुझको मंजिल ना मिली
मुश्किलों में चलाना यूँ ही निकले ॥

ये खुशबु जरा जानी पहचानी लगी
लगता है "अर्श"इधर से ही निकले ॥

प्रकाश"अर्श"
०२/०१/२००९

Thursday, January 1, 2009

है मुनासिब के याद-दाश्त मेरी ग़लत हो ...

वो कौन है जो मेरी तरह दिखता है ।
है मेरा अक्स या मेरी तरह दिखता है ॥

देखकर उड़ते परिंदों को दिल मेरा रोए
उड़ान तू भी तरसे तो मेरी तरह दिखता है ॥

लहू को उसके रगों का मुआयना कर लो
लहू सा है तो फ़िर मेरी तरह दिखता है ॥

मैं हूँ जो बस गैरते-साजिश में मारा गया
तू ठुकराया हुआ है तो मेरी तरह दिखता है ॥

है मुनासिब के याद-दाश्त मेरी ग़लत हो
वादा उसने किया था जो मेरी तरह दिखता है ॥

होता एहसास अगर"अर्श"अपने जुल्मों का
ना करता चर्चे अगर मेरी तरह दिखता है ॥

प्रकाश"अर्श"
०१/०१/२००९

Tuesday, December 30, 2008

दरिया है वो प्यासा है वो देखो नकाब में ...

चेहरा छुपाए रख्खा है वो देखो नकाब में ।
कातील है फ़रिश्ता है वो देखो नकाब में ॥

कत्ल करता है ऐसे के पता भी ना चले ,
जख्म देता है गहरा है वो देखो नकाब में ॥

हमसे रूठा है ये सितम है या अदा उसकी
जैसा भी है अच्छा है वो देखो नकाब में ॥

नाजुक लबों से उसके मोहब्बत की सदा सुन
जिन्दा हूँ के आया है वो देखो नकाब में ॥

मैं हूँ इस बात पे खामोश तू उसकी सब्र देख
दरिया है वो प्यासा है वो देखो नकाब में ॥

एक बेकली है जो दफ़न है"अर्श"मेरे सीने में
एक खलिश है के तड़पता है वो देखो नकाब में ॥

प्रकाश "अर्श"
३०/१२/२००८

Saturday, December 27, 2008

अगर जुन्नार और तस्बीह दोनों एक हो जाए...

कोई लकीर नही खींचते दिलों के रास्ते में ।
के हमारा घर नही बांटता मीलों के रास्ते में ॥

दोनों सरहद में बंटें है मगर यूँ गुमराह न हों
के अनपढ़ आ नही सकता काबीलों के रास्ते में ॥

मौज आएगी टकराएगी मगर ये डर कैसा
के मौज दम भी तोडे है साहिलों के रास्ते में ॥

दोनों ने तान रखा है निशाना एक दूजे पे
कोई फ़िर आ नही सकता जाहिलों के रास्ते में ॥

रगों में खून भी बहता है उसके मेरे पूर्वज का
हमारी पहचान रहे कायम तब्दीलों के रास्ते में ॥

अगर जुन्नार और तस्बीह दोनों एक हो जायें
कोई फ़िर आ नही सकता फाजिलों के रास्ते में॥


प्रकाश"अर्श"
जुन्नार=जनेऊ ,तस्बीह=मुसलमानों का जाप माला
फाजिलों= प्रवीन,श्रेष्ठ ।