Thursday, June 18, 2009

इश्क मोहब्बत आवारापन...



इस महीने इतने हादसे हुए कवि जगत पे जिससे मन आहत है मेरे और मेरे परम आदरणीय गूरू जी के तरफ़ से इस अपुरनिया क्षति को तथा उन सभी वरिष्ठ और सम्मानीय दिवंगत कविओं को नम आंखों से श्रधांजलि ॥ आज मेरे इस ब्लॉग का भी एक वर्ष पूरा हो गया है ये मुमकिन सिर्फ़ आप सज्जनों के प्यार, स्नेह और आर्शीवाद से हुआ है , वरना मैं अदना ये सफर कैसे तय कर सकता था, जिसमे मेरे गूरू जी ने मुझे उंगली पकड़ कर चलना सिखाया ॥ ये गूरू शिष्य परम्परा ता-उम्र यूँ ही चलती रहेगी सीखने सिखाने की यही ऊपर वाले से दुआ करूँगा के गूरू जी का आर्शीवाद और आप सभी का प्यार बना रहे ... एक छोटी बह'र की बे-रदीफ़ ग़ज़ल आप सभी के सामने है ,प्यारऔर आर्शीवाद के इंतज़ार में .... आप सभी का "अर्श"




इश्क मोहब्बत आवारापन।
संग हुए जब छूटा बचपन ॥

मैं माँ से जब दूर हुआ तो ,
रोया घर, आँचल और आँगन ॥

शीशे के किरचे बिखरे हैं ,
उसने देखा होगा दर्पण ॥

परदे के पीछे बज-बज कर ,
आमंत्रित करते हैं कंगन ॥

चन्दा ,सूरज ,पर्वत, झरना ,
पावन पावन पावन पावन ॥

बिकता हुस्न है बाज़ारों में ,
प्यार मिले है दामन दामन ॥

कौन कहे बिगडे संगत से ,
देता सर्प को खुश्बू चंदन ॥

दुनिया उसको रब कहती है ,
मैं कहता हूँ उसको साजन॥



प्रकाश "अर्श"
१८/०६/२००९

Friday, May 29, 2009

यूँ हस्ती मिटा कर ....

गूरू जी के आर्शीवाद से छोटी बह'र की एक और ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ... आप सभी का प्यार और आर्शीवाद चाहूंगा...

बह'र - १२२ १२२

फ़ऊलुन फ़ऊलुन



मैं खुश हूँ उड़ा कर ।
यूँ हस्ती मिटा कर ॥

ये कैसे कहूँ मैं ,
हूँ जिंदा भुला कर ॥

वो आया नहीं क्यों ,
बता दो पता कर ॥

सुना फैसला अब ,
तू हां कर या ना कर ॥

मुझे उसने लूटा ,
पड़ोसी मिला कर ॥

लिखा है ये माँ ने ,
तू आजा खुदा कर ॥

दुआ ज़िन्दगी की ,
हलाहल पिला कर ॥

वो बदनामी को भी ,
गया ले भुना कर ॥

करे अर्श अब क्या ,
वो बैठा है आ कर ॥


प्रकाश"अर्श"

Friday, May 22, 2009

थके - थके से कदम ...






हाँ
जब भी
मैं अपने थके - थके से कदम ,
घुटती साँसे,
और
टूटती धड़कनों ,
की
तरफ़ बोझिल आंखों से ,
देखता हूँ,
तो ये
चमकती आंखों से
कहती है
सब
के
सब
हम तो नही ठहरे
फ़िर तुम क्यूँ ?




Thursday, May 7, 2009

ये मनाने का हुनर हो शायद ...

गूरू देव ने इसे छू लिया और ये कहने लायक बन पडी है आप सभी का आर्शीवाद भी चाहूँगा ...

बहरे रमल मुसद्दस मखबून मुसक्कन
( २१२२ ११२२ २२ )


मेरा भी दिल-ओ- ज़िगर हो शायद ।
उसको भी इसकी ख़बर हो शायद ॥

रास्ते दे रहे आवाज़ मुझे ।
मेरी किस्मत में सफर हो शायद ॥

दूर जाकर के वो बैठा मुझसे ।
ये मनाने का हुनर हो शायद ॥

बस्तियों को जो जला कर खुश है ।
उनका भी इक कहीं घर हो शायद॥

मैं फकीरों की तरह फिरता हूँ ।
उनपे अल्लाह की मेहर हो शायद ॥

'अर्श' रहता है अंधेरों में अब ।
क्या पता कल न सहर हो शायद ॥


प्रकाश"अर्श"
०७/०५/२००९

Friday, May 1, 2009

वो कातिल अदा उफ़ ...

लगातार बड़ी बहर पे लिखने के बाद एक छोटी बहर की ग़ज़ल आप सभी के सामने लेकर आया हूँ आर्शीवाद गूरू देव का है, आप सभी का भी स्नेह और आर्शीवाद चाहूँगा ....


बहर .... १२२ १२२
फ़ऊलुन फ़ऊलुन


वो कातिल अदा उफ़
वो हुस्न-ऐ शबा उफ़ ॥

हैं दीवाने हम पर
हां तेरी वफ़ा उफ़ ॥

है दिल हारने में
लो नुक्सा नफ़ा उफ़ ॥

वो आदाब में भी
नजाकत है क्या उफ़ ॥

लगी भीड़ कैसी
है क्या माजरा उफ़ ॥

वो जां लेके बोले
तुम्हे क्या हुआ उफ़ ॥

चले उसको छूकर
ये आबो हवा उफ़ ॥

दबे लब से कहना
वो है'अर्श'का उफ़ ॥

प्रकाश"अर्श"
०१/०५/२००९

Tuesday, April 21, 2009

मां सबसे है पहले मिरी लिल्लाह खुदाओं में...

माँ की दिली पुकार ने इस ग़ज़ल को जन्म दिया और इसे कहने लायक परम आदरणीय गूरू देव ने बनाया ... आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहता हूँ ....

बहर - २२१ १२२१ १२२१ २१२
मफऊलु मुफाईलु मुफाईलु फाएलुन



इतना तो असर है मेरी माँ की दुआओं में ।
टूटा हुआ पत्ता भी बसे है फिजाओं में ॥

बादल भी था बिजली भी थी तूफां भी तेज था ।
आंचल ने बचाए मुझे रक्खा घटाओं में ॥

आंखों से हूँ ओझल ओ' बड़ी दूर हूँ मगर ।
दे जाती है ममता मुझे अम्मा हवाओं में ॥

देती न सलीका जो वो चलने का धूप में
कैसे मैं भला बैठ यूँ पाता क़बाओं में ॥

देखा नही रोते हुए दुख में कभी उसे ।
हां आंखें छलकती है खुशी की सदाओं में ॥

वो पूजते पत्थर है मैं इंसान पूजता हूँ
मां सबसे है पहले मिरी लिल्लाह खुदाओं में ॥

हर मर्ज को हाथों से मां छूकर भगाए ज्यों ।
तासीर मिली अर्श को कब वो दवाओं में ॥

प्रकाश'अर्श"
२१/०४/२००९

Tuesday, April 14, 2009

मेरे सिरहाने उड़नतस्तरी ...

हर सुबह की तरह आज की सुबह नही थी अगर ऐसा कहूँ तो कोई आश्चर्य की बात ना होगी.हालाकि सुबह तो आज भी हुई थी हर रोज अपने माता पिता को नमन कर बिस्तर त्यागता था मगर आज बिस्तर त्याग ही नही पाया कारण ये था के जैसे ही मेरी आँख खुली मेरे सिरहाने एक कुरियर था ,उन्धियाते आंख से देखा तो मेरे नाम से ही था मगर निचे छोटे अक्षरों में एक नाम था जो ब्लॉग जगत में उड़नतस्तरी के नाम से हर ओर जगमाता रहता है और वो नाम था प्रसिद्ध ब्य्न्ग्कार हास्य लेखक और मेरे बड़े भाई श्री समीर लाल जी का।

घोर आश्चर्य प्रफूलित और अपने आप पे गर्व महसूस कर रहा था मैं दिल ही दिल उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दे रहा था । और एक और सुबह जो जिंदगी में कभी ना भूल पाने वाली हो गई क्युनके मैं हमेशा कहता हूँ के हर दिन नही भूल पाने वाला दिन हो ये मुमकिन नही होता।और ये आज का दिन बड़े भाई के नाम कर दिया मैंने भी . हो सकता है इस पुस्तक को सबसे पहले पाने वाला शायद मैं बन गया जैसी की मेरी दिली खाहिश थी।
बस बिस्तर पे बैठे बैठे ही इस पुस्तक को पढ़ना शुरू कर दिया,जितने दिल के धनी वो है उसके क्या कहने पुस्तक को समर्पित किया है आपने माँ को मैं ये सवाल करता हूँ उनसे के ये सभी माये देखने में एक जैसी क्यूँ होती है ?
मैंने कभी उन्हें देखा नही मगर मेरा नमन है उनको।
माँ के तस्वीर के निचे बिखरे हुए पाँच मोती है क्रमशः गीत ,छंद मुक्तक कविताएं ,ग़ज़ल, मुक्तक और फ़िर क्षणिकाएं क्रमागत रूप से जैसे पुरी तरीके से माँ को समर्पित। इस भावविशेष पे उन्हें बधाई ॥
मैं पांचो को थोड़ा थोड़ा करके बताऊंगा ...
कल तक लोग सामील लाल जी के हास्य स्वरुप को देखा होगा और ख़ुद मैं भी उनके इसी स्वरुप से परिचित था मगर वो इस तरह के गंभीर विषय पे लिख सकते है या ये गंभीर स्वरुप भी उनका है ये समझ नही पाया था !!! चलिए मिलते है उनके कई स्वरुप से ..
गीत :- अपनी माता जी को समर्पित इस गीत के बारे में क्या कहने
सूरज क्यूँ इतना तपता है
मेरा अंग अंग जलता है
पहले सा सूरज लगता है
पर कितनी तेज चमकता है
मेरी चाट न जाने कहाँ गई
छाँव पाने को दिल मचलता है
माँ ! तू जबसे दूजे जहाँ गई
ये घर बिन चाट का लगता है
माँ के बारे में इतनी गंभीर बात अगर कोई लिख सकता है तो उसके बारे में हास्य की अवधारण सिरे से खारिज हो जाती है स्वतः ही । बस ये कहूँ के मशहूर शईर जनाब मुनव्वर राणा साहिब के बाद समीर जी को ही पढा इस तरह से माँ पे । इस कविता के लिए उनके लेखनी को सलाम ।

छंद मुक्तक कवितायें :- जरा इस गहरी और अप्रतिम सोच को पढ़े और कहें की क्या ये समीर लाल जी ने ही लिखी है ??? तो मैं कहता हूँ जरा मजाकिए किस्म के इंसान के इस गहरी सोच का क्या कोई अंदाजा लगा पायेगा। जो आपनी सरल भाषा शैली जो मूलतः बोल चाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है मानस पटल पे इतनी गहरी छाप छोडेगी ...... ।
१. दालान से नीचे उतरती
दो सीढियों के
सिल के बीच से
उग आई
कहती है मुझसे
हमें अपनी स्पेस
बनाना आता है
मुझे अवाक देख
दीवार पर लगी काई
मेरी पतनशील सोच को
मुंह चिढा रही है...

२ साहिल पे बैठा
वो जो डूबने से बचने की
सलाह देता है
उसे तैरना नही आता
वरना
बचा सकता था ...

धन्य हुआ मैं तो इस तरह पे सोच को पढ़ के कमाल कर दिया है समीर लाल जी ने॥
अब चलते है ग़ज़ल की ओर जो मेरा सबसे पसंदीदा साहित्यिक भाग है या ये कहूँ के मेरे रगों में बसी है तो ग़लत ना होगा मगर इस पहचानने वाले मेरे गूरू श्री पंकज सुबीर जी है तो इसे निरंतर निखारने में लगे है ॥मगर अभी बात करते है समीर लाल जी के ग़ज़ल लेखन की.........
ग़ज़ल:-
देखता हूँ बैठ कर मैं इस चिता पर कब्रगाह
छोड़ दो इस बात को,ये मजहबी हो जायेगी ॥
समाज में धर्म के नाम पर जो दंगे फसाद हो रहे है और जो आतंक देखने में आ रहा है क्या ये शे'र मुकम्मल तरीके से प्रर्दशित नही कर रहा है इस शेर पे आज के जाने माने ग़ज़लों में खासा दखलंदाजी रखने वाले डाक्टर कुवंर बेचैन साहिब ने उनकी पीठ थपथपाई है, किसके मुंह से इस शे'र पे वाह वाह नही निकलेगी... ये इंसान इंतनी गहरी बात को इतनी आसानी से लिख लेगा हतप्रभ हूँ मगर कोई शक नही॥

एक और शे'र लिखने से अपने आपको रोक ना सका॥

फ़ैल कर के सो सकूँ इतनी जगह मिलती नही
ठण्ड का बस नाम लेकर,मैं सिकुड़ता रह गया ॥
क्या ये शे'र गहरे भावबोध का परिचय नही करा रही है मानसपटल पर...

और छोटे बहर के ये दो शे'र ....

मौत से दिल्लगी हो गई
ज़िन्दगी अजनबी हो गई

साँस गिरवी है हर इक घड़ी
कैसी ये बेबसी हो गई ॥

जैसा की मेरे गूरू देव कहते है के छोटे बहर पे लिखना जितना आसान दीखता है उतना होता नही क्युनके आपको कम शब्द में पुरा का पुरा कथ्य को सम्पूर्ण करना होता है ,इस बात पे समीर जी के क्या कहने छोटी बहर के उस्ताद शाईर ....

मुक्तक:-
सिर्फ़ एक मुक्तक ने मेरा दिल लूट लिया .....
नज़र पड़ती है धरती पर,वहाँ तारे भी रोते है
असर है खौफ का ऐसा खुली आँखों ही सोते है
सजगा जब तलक होगी,ज़रा हम चैन पा लेंगे
अधिकतर चुक के किस्से,बड़े शहरों में होते है॥

कितने खुले विचार को शब्द बोध में बाँध कर के रखा है समीर लाल जी ने ॥

क्षणिकाएं:-
एक गरीब और बेचारी मान को देखिये कैसे बच्चे को जीना सिखाती है...

रोटी के लिए
बच्चे की जिद
और वो बेबस लाचार माँ
उसे मारती है,
वो जानती है भूख का दर्द
मार के दर्द में
कहीं खो जायेगा
कुछ देर को ही सही
बच्चा रोते रोते
सो जायेगा ॥
एक और समसामयीक पे क्षणिका इसके बाद आपको भी पता लग जायेगा के समीर लाल जी कितने ठोस ब्यंग्कार है ...

ऊँचे अंक लाने के बाद भी
वो प्रतिक्षा सूचि में
खडा है...
आरक्षण का तमाचा
सीधा उसके गाल पर
पडा है....

देखिये इस लेख और रचना को कितनी गंभीरता लिए हुए है ...

बस यही कहूँगा के कौन कहता है के ये बिखरे मोती है, मैं तो कहता हूँ के ये तो मोतिओं से भरी हुई और सजी हुई माला है जिसके सारे के सारे मोतियाँ मुकम्मल है...आख़िर में मैं समीर लाल जी और अपने बड़े भाई को दिल इस पुस्तक के लिए दिल से बधाई और ढेरो शुभकामनाएं देता हूँ और इसकी असीम सफलता की कामनाएं करता हूँ... साथ में शिवना प्रकाशन का भी आभार....

पुस्तक प्राप्ति :-
मूल्य मात्र रु २००/-
प्रकाशक; शिवना प्रकाशन
पी सी लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड के सामने, सीहोर,
मध्यप्रदेश ४६६००१ भारत ॥
दूरभाष: ९१-९९७७८५५३९९

प्रकाश"अर्श"
१४/०४/२००९

Saturday, April 11, 2009

कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ...

परम श्रधेय गूरू देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल कुछ कहने लायक बनी है आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा...


बहरे-हजज मुसमन सालिम (१२२२*४)


हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए ।
के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए ॥

हिकारत से यूँ रस्ते में मुझे जालिम ना देखा कर
मुहब्बत इस कदर ना कर कोई मगरूर हो जाए ॥

जली होंगी कई लाशें दफ़न होंगे कई किस्से
संभलना शहर फ़िर कोई ना भागलपूर हो जाए ॥

कोई शिकवा हो तो कह दे इसे ना दिल में रक्खा कर
ज़रा सा जख्म है बढ़कर न ये नासूर हो जाए ॥

जिसे भी देखिये वो बेदिली से देखता है अब
मुहब्बत करने वालों का न ये दस्तूर हो जाए ॥

वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ॥

है पीना कुफ्र ये जो"अर्श"से कहता रहा कल तक
वही प्याला लबों को दे तो फ़िर मंजूर हो जाए ॥

प्रकाश"अर्श"
११/०४/२००९

Monday, March 30, 2009

मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ...

परम आदरणीय और मेरे गूरू वर श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए प्रतीक्षारत ....


हाय वो वक्त किस कदर होगा
मेरा महबूब मेरे घर होगा ।

दिल हमारा है प्रेम का मन्दिर,
हम पे नफ़रत का ना असर होगा ।

घर बनाते है पत्थरों के सब
मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ।

उनसे जब सामना होगा मेरा
दिल मेरा आसमान पर होगा ।

दिल को छलनी किया है नज़रों ने
इस पे कब मरहमे नज़र होगा ।

आज फ़िर ज़िन्दगी बुलाती है
आज फ़िर से शुरू सफर होगा ।

उनसे नज़रें मिलाये बैठा है
अर्श को मौत का ना डर होगा ॥


बहर .... २१२२ १२१२ २२
प्रकाश'अर्श'
३०/०३/२००९

Sunday, March 22, 2009

तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ...

परम आदरणीय श्री प्राण शर्मा जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए....


तेरा चेहरा मुझे अच्छा लगे है ।
तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ॥

मेरी किस्मत कहाँ मुझको मिले तू
तुझे पा लू मुझे किस्सा लगे है ॥

तुम्हारी बात में ऐसा असर है
ये मिट के भी मुझे पुख्ता लगे है ॥

मेरी किस्मत में चलना ही है यारो
मेरी मंजिल मुझे रस्ता लगे है ॥

तुम उससे पूछते हो दोस्तो क्या
कि वो हर बात में बच्चा लगे है ॥

भुला पाउँगा इसको'अर्श' कैसे
तुम्हारा प्यार नित सच्चा लगे है ॥

बहर १२२२ १२२२ १२२
प्रकाश'अर्श'
२२/०३/२००९

Sunday, March 15, 2009

साहित्य ,ज्ञानपीठ और गुरु देव....

कुछ बात है के हस्ती मिटती नही हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन दौरें जहाँ हमारा ॥

शनिवार की सुबह ऐसे तो 11 बजे से पहले मेरी आँख नही खुलती कभी मगर आज का ये दिवस जैसे मेरे पुरे जीवन के लिए नही भूल सकने और मिटने वाला है । हमेशा से ही ये सोचता था के हर दिन ऐसा हो के हमेशा के लिए याद रह जाए मगर ये मूलतः सम्भव नही है ,हर एक के लिए उसके जीवन में ।
मुझे इस बात का जारा सा भी इल्म नही था के साहित्य ,हिन्दी भवन ,और मेरे गुरु जी एक साथ ही मुझे मिलेंगे। जैसे ही मैं हिन्दी भवन पहुँचा गुरु जी पहले ही पहुँच चुके थे समय पे जैसे ही मैंने उनका चेहरा पहली दफा देखा धन्यभाग मेंरे कितनी सहजता से उन्होंने मुझे गले लगने पे बिवश किया मेरे चरण छूने पे ,पता नही ये कैसी तस्कीन थी उनसे गले लग के एक अलग सी शान्ति और सुकून मिला जो पहले कभी भी एहसास नही हुआ ।

जब गुरु जी को नवलेखन के लिए सभागार के सबसे अगली पंक्ति में बैठने को
कहा गया तो मैं ह्रदय से प्रफुल्लित और भाव बिभोर हो उठा इस बात का सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है के भारत जैसे विशाल देश में एक छोटे से कसबे सीहोर का वो शांत मृदुल और विनम्र स्वाभाव का ब्यक्ति साहित्य जगत में आज सबसे पहली पंक्ति में बैठा है । शायद इस बात का अंदेशा उन्हें भी नही था ।जो मंच पे या खचाखच भरे सभागार में बैठे हजारो लोग थे ।

मंच पे साहित्य जगत के बड़े-बड़े हस्ताक्षातर श्री कुंवर नारायण ,अजित कुमार, अशोक वाजपयी, श्री कैलाश वाजपयी,और सुश्री रिता शुक्रल जी आसीन थे । वो गर्व महसूस कर रहे होंगे के उनके सामने ये सरल स्वाभाव का इंसान जो बैठा है उतराधिकारी के रूप में है, उसके हाथ में हिन्दी जगत का भविष्य बहोत उज्जवल है और सुरक्षित भी ।

ईस्ट इंडिया कंपनी १५ छोटी छोटी कहानियो का संकलन है । जिसमे सारे के सारे मोतिओं के समान कहानियाँ है को गुरु जी ने पिरोया है हमारे लिए ।
साहित्य जगत में अमिट दखल रखने वाली सुश्री रिता शुक्ला जी औरज्ञानपीठ के निदेशक श्री रविन्द्र कालिया जी ने पुस्तक का विमोचन किया ऐसा लग रहा था के जैसे माँ
सरस्वती ख़ुद धारा पे आई है और उतराधिकारी को उसका राज तिलक कर रही है ,मुख्या मंत्री साहिबा थोडी देर थी तो एक बात सबको ध्यान रहे समय किसी का इंतज़ार नही करता ,हालाकिं वो आई मगर अफ़सोस जाहिर करने के सिवा उनके पास कुछ भी नही था ।आप सभी तो राजनीति, मसरूफियत और देर से आना ये सारे एक ही घडे के पानी पिने के समान है समझ सकते है।

पुस्तक विमोचन के बाद हम श्री कुंवर नारायण जी मिले और उनका आशीर्वाद लिया । साहित्य जगत और साहित्य से मेरी मुलाक़ात ये मेरी ज़िन्दगी में पहली दफा है रही थी, मैं उत्सुक था,सभी से मिलने केलिए ख़ुद गुरु वर मुझे नए और पुराने लेखको से मेरा परिचय करा रहे थे "अर्श" के रूप में ।

वहां से हम केन्नोट पैलेस में लंच लेने के लिए वही पे गुरु जी से विस्तार से बात होती रही डाईनिंग टेबल पे । फ़िर होटल गए वहां खूब गप्पे मारे , गुरु जी से सीखता रहा उनके आशीर्वचन सुनता रहा लेख और लेखनी के बा
रे में ।
शाम को थोड़ा घुमाने गए । घुमाते घूमते एक होटल में अल्पाहार लेने गए ,एक और बात है गुरु जी के सेहत से आप ये बात बिल्कुल नही कह सकते के ये इंसान खाने का खूब शौकीन है मगर सिर्फ़ शौक रखते है खाते नही ।

लौटने के बात देर रात तक होटल में बात चलती रही उनके साथ सोनू जी भी आए थे उनसे से भी मुलाक़ात हुई
। फ़िर रात्रि १२ बजे मैं वापिस आगया ताकि सुबह वाली ट्रेन में जानी है इन दोनों लोगों को तो थोड़ा आराम का भी मौका मिले कल से है इन्हे सब तो नसीब था मगर आराम नही कर पा रहे थे मेरे मिलने से और कहूँ तो उत्सुकता से मिलने को लेकर॥
गुरु जी की पहली पुस्तक को सबसे पहले खरीदने का गौरव भी मुझे प्राप्त हुआ उनके हस्ताक्षर सहित और एक और लेखक श्री रविकांत जी की पुस्तक यात्रा को भी सबसे पहले मैंने ही ख़रीदा ॥
पुस्तक प्राप्ति का पता है १८, इन्स्तितुशनल एरिया ,लोदी रोड नई दिल्ली -११०००३
मूल्य मात्र रु .१३०/-
बस एक शे'र है के ...
वो मिले बिछड़ भी गए और चुप हो रहे
जैसे मुख्तशर सी बात में सदियाँ गुजर गयी ॥

प्रकाश'अर्श'
१५/०३/२००९

Wednesday, March 11, 2009

शाम को डूबते हुए सूरज...

होली के पवन पर्व पे आप सभी को ढेरो बधाई... बस एक दिली-खाईश थी के आप सभी के सामने एक नज़्म पेशकरू... आप सभी का प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा...

सबसे पहले बादशाह शाईर जनाब बहादुरशाह जफ़र का ये शे'र

हम ही उनको बाम पे लाये,और हम ही महरूम रहे ॥
पर्दा हमारे नाम से उठा ,आँख लडाई लोगों ने...


शाम को
डूबते हुए सूरज की
नर्म और मुलायम किरणे
जब धीरे से
छूती है तो लगता है
तुम्हारी रेशमी जुल्फें
अभी -अभी
मेरे चेहरे पे सरकती हुई
गालों पे एक-दुसरे के साथ खेल रही है
तुम्हारी खुशबू जहन में
उतरते हुए कहती है
'भर लो मुझे'
और इस तरह के हवाओं से
खुशबू ख़त्म हो जाए
ये सोच के ही इक जुम्बिश सी होती है
तुम लौट आवो
ये तस्कीन वो जौक
स्वर्ग है मेरे लिए ॥



प्रकाश'अर्श'
११/०३/२००९
जुम्बिश=वईबेरेशन ,
तस्कीन=सुकून,शान्ति
जौक=स्वाद...

Thursday, March 5, 2009

आंखें दो काली ऐसे थीं मशहूर शहर में ...

परम श्रधेय गुरु देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल ,आप सबके सामने प्रस्तुत है ,आप सभीका प्यार और आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ.... आप सभी को होली की अनंत -असीम शुभकामनाएं सहित ....

बहर ... २२१ २१२१ १२२१ २१२


भरती रही वो सिसकियां देखा कोई न था ।
किस चाल से चला के ज्‍युं आया कोई न था ॥

किस मौज से खड़ा हुआ खंडहर है देखिये ।
कैसे कहूं के दिल यहां टूटा कोई न था ॥

आंखें दो काली ऐसे थीं मशहूर शहर में ।
दोनों जहां में जैसे के दूजा कोर्इ न था ॥

देता रहा वो धूप में छाया गुलों से ही ।
उस पेड़ में पलाश के पत्‍ता कोई न था ॥

मुझको तसल्लियां तो मिलीं सबसे'अर्श' पर ।
देखा पलट के जब भी तो अपना कोई न था ॥


प्रकाश'अर्श'
०५/०३/२००८

Saturday, February 28, 2009

अदब से मौत का भी सामना करे कोई ...

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी
के सामने है ... आप सभी के प्यार औरआशीर्वाद का आकांक्षी हूँ ....



ये मुख्‍़तसर सी जि़ंदगी है क्‍या करे कोई ।
है सांस आखिरी बची दुआ करे कोई ॥

घुटन है जिन्‍दगी ये फिर भी जी रहा हूं मैं ।
क्‍युं आखिरी में बात बेमजा करे कोई ॥

मिले हैं मौत से तो झूम कर के हम गले ।
बला से अपने जिन्‍दगी कहा करे कोई ॥

यकीन है वो आयेगा जरूर लौट कर ।
उसीके इन्‍तजार में जिया करे कोई ॥

कला तो सीखते हैं जिन्‍दगी की सब यहां ।
अदब से मौत का भी सामना करे कोई ॥

किसे रहे थे अर्श ढूंढ ख्‍वाब में भला ।
ये नींद टूटने पे क्‍या पता करे कोई ॥

प्रकाश'अर्श'
२९/०२/२००९


Thursday, February 19, 2009

नहीं के हमको निभाना नही आता ...

गुरु जी के आशीर्वाद के इंतज़ार में......



नहीं के हमको निभाना नहीं आता ॥
वक्त पे उनको भी आना नहीं आता ॥

जरा सी बात पे देखो वो रूठ जाते है ,
क्या कहूँ उनको सताना नही आता ॥

रस्म तो रस्म है क्यूँ घबरा रहे हो तुम ,
क्या तुम्हे रस्म निभाना नही आता .?

अभी तो आए हो जी-भर के देख तो लूँ
तुम्हे न जाने का बहाना नही आता ॥

आज का दौर है दिखावे का सुनो तुम ,
तू रह जाएगा गर दिखाना नही आता ॥

तू कहे 'अर्श'तेरे कुचे में दम निकले ,
बस ये है तुझे आजमाना नहीं आता ॥

प्रकाश'अर्श"
१९/०२/२००९

Sunday, February 1, 2009

तुम्हे रात-दिन क्यूँ मैं सोचा करूँ ...

आप सबके सामने एक गीत नज़्र कर रहा हूँ ,जो मूलतः पहली गीत है इस ब्लॉग पे मेरी ।गलती के लिए मुआफी चाहूँगा ....


तुम्हे रात-दिन क्यूँ मैं सोचा करूँ।
तेरे ख्वाब ही अक्सर देखा करूँ॥

नहीं के हमें दिल लगना नही था
गली हुस्न की हमको जाना नही था
बना के खुदा फ़िर क्यूँ सजदा करूँ ॥
तेरे ख्वाब ही .......

अभी दिल हमारा धड़कना था सिखा
तुम्हारी नज़र से बचाना किसीका
मैं जिन्दा रहूँ या के तौबा करूँ ॥
तुम्हे रात दिन ........

हमारी मोहब्बत के चर्चे है देखो
तुम्हे जानते है मेरे नाम से वो
है खाई कसम क्यूँ मैं धोखा करूँ ॥
तुम्हे रात दिन .....
तेरे ख्वाब ही अक्सर ....


प्रकाश"अर्श"
०१/०२/२००९

Thursday, January 15, 2009

ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ...

बहरे खफीफ ..............................................आशीर्वाद
२१२२-१२१२-२२....................................गुरु देव पंकज सुबीर जी

मैंने भी दिल लगा लिया यारों।
जख्म पे जख्म पा लिया यारों ॥

मौज फ़िर ज़िन्दगी नही देती ।
जख्म गहरा जो ना लिया यारों ॥

आज ना डगमगा के चल पाया ।
वादा बादे पे था लिया यारों ॥

हादसे और हो गए होते ।
ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ॥

दफ्न कर 'अर्श'लौट जाओ तुम।
रूह तो और जा लिया यारों ॥

प्रकाश'अर्श'
१५/०१/२००९
बादे=शराब ,जा=जगह ।

Sunday, January 11, 2009

रे मर जाएगा क्यूँ सोचे है ...

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल ...

कल क्या होगा,क्यूँ सोचे है
मर जाएगा, क्यूँ सोचे है ॥

खुद को तक, गिरवी रक्‍खा है
बिक जाएगा ,क्यूँ सोचे है ॥

अपना घर कितना अपना है
वो आएगा ,क्यूँ सोचे है ॥

शेर नहीं दिल, के छाले हैं
वो समझेगा ,क्यूँ सोचे है ॥

बीत गया जो, रीत गया जो
फ़िर लौटेगा ,क्यूँ सोचे है ॥

अर्श है बेबस ,इस दुनिया में
पछतायेगा , क्यूँ सोचे है ॥

प्रकाश"अर्श"
११/०१/२००९

Saturday, January 10, 2009

जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था...

उसको मेरी मोहब्बत का एतबार न था ।
मैं लौट आऊंगा उसे मिरा इंतज़ार न था॥

वो लौट आई है शहर में मोहब्बत लेकर
बचपन का प्यार शायद यादगार न था ॥

लिखती थी हथेली पे वो इक नाम हमेशा
देखा तो नाम मिरा वो गमगुसार न था ॥

पूछता रहा मैं हाल उसका औरों के हवाले
जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था॥

आया है वो भी देख लो चार अश्क बहा के
जिस मजार पे गया था वहां अश्कबार न था॥

आया हूँ कहीं और या हूँ अपने शहर में
पहले तो बागबां"अर्श"यूँ बे-बहार न था ॥

प्रकाश"अर्श"
१०/०१/२००९

Tuesday, January 6, 2009

आप ही कन्धा आप ही जनाजा ...

पुरानी रंजिश को हवा दीजे ।
फ़िर वही सूरत दिखा दीजे ॥

आज मजबूर-ऐ हालात दिल है
मर ही जाने का हौसला दीजे ॥

हाथ में चार पैसे है बचे अब
ना कहना चाँद-तारे ला दीजे ॥

मैं ग़लत हूँ मुजरिम हूँ अगर
मुझको फंदे पे लटका दीजे ॥

आखिरी ख्वाहिश भी छुपा लूँगा
आप जल्दी से दफना दीजे ॥

आप ही कन्धा आप ही जनाजा
"अर्श"कब्र का रास्ता दिखा दीजे॥


प्रकाश"अर्श"
०६/०१/२००९
आप =मैं ख़ुद ,