Tuesday, April 14, 2009

मेरे सिरहाने उड़नतस्तरी ...

हर सुबह की तरह आज की सुबह नही थी अगर ऐसा कहूँ तो कोई आश्चर्य की बात ना होगी.हालाकि सुबह तो आज भी हुई थी हर रोज अपने माता पिता को नमन कर बिस्तर त्यागता था मगर आज बिस्तर त्याग ही नही पाया कारण ये था के जैसे ही मेरी आँख खुली मेरे सिरहाने एक कुरियर था ,उन्धियाते आंख से देखा तो मेरे नाम से ही था मगर निचे छोटे अक्षरों में एक नाम था जो ब्लॉग जगत में उड़नतस्तरी के नाम से हर ओर जगमाता रहता है और वो नाम था प्रसिद्ध ब्य्न्ग्कार हास्य लेखक और मेरे बड़े भाई श्री समीर लाल जी का।

घोर आश्चर्य प्रफूलित और अपने आप पे गर्व महसूस कर रहा था मैं दिल ही दिल उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दे रहा था । और एक और सुबह जो जिंदगी में कभी ना भूल पाने वाली हो गई क्युनके मैं हमेशा कहता हूँ के हर दिन नही भूल पाने वाला दिन हो ये मुमकिन नही होता।और ये आज का दिन बड़े भाई के नाम कर दिया मैंने भी . हो सकता है इस पुस्तक को सबसे पहले पाने वाला शायद मैं बन गया जैसी की मेरी दिली खाहिश थी।
बस बिस्तर पे बैठे बैठे ही इस पुस्तक को पढ़ना शुरू कर दिया,जितने दिल के धनी वो है उसके क्या कहने पुस्तक को समर्पित किया है आपने माँ को मैं ये सवाल करता हूँ उनसे के ये सभी माये देखने में एक जैसी क्यूँ होती है ?
मैंने कभी उन्हें देखा नही मगर मेरा नमन है उनको।
माँ के तस्वीर के निचे बिखरे हुए पाँच मोती है क्रमशः गीत ,छंद मुक्तक कविताएं ,ग़ज़ल, मुक्तक और फ़िर क्षणिकाएं क्रमागत रूप से जैसे पुरी तरीके से माँ को समर्पित। इस भावविशेष पे उन्हें बधाई ॥
मैं पांचो को थोड़ा थोड़ा करके बताऊंगा ...
कल तक लोग सामील लाल जी के हास्य स्वरुप को देखा होगा और ख़ुद मैं भी उनके इसी स्वरुप से परिचित था मगर वो इस तरह के गंभीर विषय पे लिख सकते है या ये गंभीर स्वरुप भी उनका है ये समझ नही पाया था !!! चलिए मिलते है उनके कई स्वरुप से ..
गीत :- अपनी माता जी को समर्पित इस गीत के बारे में क्या कहने
सूरज क्यूँ इतना तपता है
मेरा अंग अंग जलता है
पहले सा सूरज लगता है
पर कितनी तेज चमकता है
मेरी चाट न जाने कहाँ गई
छाँव पाने को दिल मचलता है
माँ ! तू जबसे दूजे जहाँ गई
ये घर बिन चाट का लगता है
माँ के बारे में इतनी गंभीर बात अगर कोई लिख सकता है तो उसके बारे में हास्य की अवधारण सिरे से खारिज हो जाती है स्वतः ही । बस ये कहूँ के मशहूर शईर जनाब मुनव्वर राणा साहिब के बाद समीर जी को ही पढा इस तरह से माँ पे । इस कविता के लिए उनके लेखनी को सलाम ।

छंद मुक्तक कवितायें :- जरा इस गहरी और अप्रतिम सोच को पढ़े और कहें की क्या ये समीर लाल जी ने ही लिखी है ??? तो मैं कहता हूँ जरा मजाकिए किस्म के इंसान के इस गहरी सोच का क्या कोई अंदाजा लगा पायेगा। जो आपनी सरल भाषा शैली जो मूलतः बोल चाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है मानस पटल पे इतनी गहरी छाप छोडेगी ...... ।
१. दालान से नीचे उतरती
दो सीढियों के
सिल के बीच से
उग आई
कहती है मुझसे
हमें अपनी स्पेस
बनाना आता है
मुझे अवाक देख
दीवार पर लगी काई
मेरी पतनशील सोच को
मुंह चिढा रही है...

२ साहिल पे बैठा
वो जो डूबने से बचने की
सलाह देता है
उसे तैरना नही आता
वरना
बचा सकता था ...

धन्य हुआ मैं तो इस तरह पे सोच को पढ़ के कमाल कर दिया है समीर लाल जी ने॥
अब चलते है ग़ज़ल की ओर जो मेरा सबसे पसंदीदा साहित्यिक भाग है या ये कहूँ के मेरे रगों में बसी है तो ग़लत ना होगा मगर इस पहचानने वाले मेरे गूरू श्री पंकज सुबीर जी है तो इसे निरंतर निखारने में लगे है ॥मगर अभी बात करते है समीर लाल जी के ग़ज़ल लेखन की.........
ग़ज़ल:-
देखता हूँ बैठ कर मैं इस चिता पर कब्रगाह
छोड़ दो इस बात को,ये मजहबी हो जायेगी ॥
समाज में धर्म के नाम पर जो दंगे फसाद हो रहे है और जो आतंक देखने में आ रहा है क्या ये शे'र मुकम्मल तरीके से प्रर्दशित नही कर रहा है इस शेर पे आज के जाने माने ग़ज़लों में खासा दखलंदाजी रखने वाले डाक्टर कुवंर बेचैन साहिब ने उनकी पीठ थपथपाई है, किसके मुंह से इस शे'र पे वाह वाह नही निकलेगी... ये इंसान इंतनी गहरी बात को इतनी आसानी से लिख लेगा हतप्रभ हूँ मगर कोई शक नही॥

एक और शे'र लिखने से अपने आपको रोक ना सका॥

फ़ैल कर के सो सकूँ इतनी जगह मिलती नही
ठण्ड का बस नाम लेकर,मैं सिकुड़ता रह गया ॥
क्या ये शे'र गहरे भावबोध का परिचय नही करा रही है मानसपटल पर...

और छोटे बहर के ये दो शे'र ....

मौत से दिल्लगी हो गई
ज़िन्दगी अजनबी हो गई

साँस गिरवी है हर इक घड़ी
कैसी ये बेबसी हो गई ॥

जैसा की मेरे गूरू देव कहते है के छोटे बहर पे लिखना जितना आसान दीखता है उतना होता नही क्युनके आपको कम शब्द में पुरा का पुरा कथ्य को सम्पूर्ण करना होता है ,इस बात पे समीर जी के क्या कहने छोटी बहर के उस्ताद शाईर ....

मुक्तक:-
सिर्फ़ एक मुक्तक ने मेरा दिल लूट लिया .....
नज़र पड़ती है धरती पर,वहाँ तारे भी रोते है
असर है खौफ का ऐसा खुली आँखों ही सोते है
सजगा जब तलक होगी,ज़रा हम चैन पा लेंगे
अधिकतर चुक के किस्से,बड़े शहरों में होते है॥

कितने खुले विचार को शब्द बोध में बाँध कर के रखा है समीर लाल जी ने ॥

क्षणिकाएं:-
एक गरीब और बेचारी मान को देखिये कैसे बच्चे को जीना सिखाती है...

रोटी के लिए
बच्चे की जिद
और वो बेबस लाचार माँ
उसे मारती है,
वो जानती है भूख का दर्द
मार के दर्द में
कहीं खो जायेगा
कुछ देर को ही सही
बच्चा रोते रोते
सो जायेगा ॥
एक और समसामयीक पे क्षणिका इसके बाद आपको भी पता लग जायेगा के समीर लाल जी कितने ठोस ब्यंग्कार है ...

ऊँचे अंक लाने के बाद भी
वो प्रतिक्षा सूचि में
खडा है...
आरक्षण का तमाचा
सीधा उसके गाल पर
पडा है....

देखिये इस लेख और रचना को कितनी गंभीरता लिए हुए है ...

बस यही कहूँगा के कौन कहता है के ये बिखरे मोती है, मैं तो कहता हूँ के ये तो मोतिओं से भरी हुई और सजी हुई माला है जिसके सारे के सारे मोतियाँ मुकम्मल है...आख़िर में मैं समीर लाल जी और अपने बड़े भाई को दिल इस पुस्तक के लिए दिल से बधाई और ढेरो शुभकामनाएं देता हूँ और इसकी असीम सफलता की कामनाएं करता हूँ... साथ में शिवना प्रकाशन का भी आभार....

पुस्तक प्राप्ति :-
मूल्य मात्र रु २००/-
प्रकाशक; शिवना प्रकाशन
पी सी लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड के सामने, सीहोर,
मध्यप्रदेश ४६६००१ भारत ॥
दूरभाष: ९१-९९७७८५५३९९

प्रकाश"अर्श"
१४/०४/२००९

Saturday, April 11, 2009

कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ...

परम श्रधेय गूरू देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल कुछ कहने लायक बनी है आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा...


बहरे-हजज मुसमन सालिम (१२२२*४)


हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए ।
के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए ॥

हिकारत से यूँ रस्ते में मुझे जालिम ना देखा कर
मुहब्बत इस कदर ना कर कोई मगरूर हो जाए ॥

जली होंगी कई लाशें दफ़न होंगे कई किस्से
संभलना शहर फ़िर कोई ना भागलपूर हो जाए ॥

कोई शिकवा हो तो कह दे इसे ना दिल में रक्खा कर
ज़रा सा जख्म है बढ़कर न ये नासूर हो जाए ॥

जिसे भी देखिये वो बेदिली से देखता है अब
मुहब्बत करने वालों का न ये दस्तूर हो जाए ॥

वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ॥

है पीना कुफ्र ये जो"अर्श"से कहता रहा कल तक
वही प्याला लबों को दे तो फ़िर मंजूर हो जाए ॥

प्रकाश"अर्श"
११/०४/२००९

Monday, March 30, 2009

मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ...

परम आदरणीय और मेरे गूरू वर श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए प्रतीक्षारत ....


हाय वो वक्त किस कदर होगा
मेरा महबूब मेरे घर होगा ।

दिल हमारा है प्रेम का मन्दिर,
हम पे नफ़रत का ना असर होगा ।

घर बनाते है पत्थरों के सब
मेरा घर खुश्बुओं का घर होगा ।

उनसे जब सामना होगा मेरा
दिल मेरा आसमान पर होगा ।

दिल को छलनी किया है नज़रों ने
इस पे कब मरहमे नज़र होगा ।

आज फ़िर ज़िन्दगी बुलाती है
आज फ़िर से शुरू सफर होगा ।

उनसे नज़रें मिलाये बैठा है
अर्श को मौत का ना डर होगा ॥


बहर .... २१२२ १२१२ २२
प्रकाश'अर्श'
३०/०३/२००९

Sunday, March 22, 2009

तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ...

परम आदरणीय श्री प्राण शर्मा जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए....


तेरा चेहरा मुझे अच्छा लगे है ।
तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ॥

मेरी किस्मत कहाँ मुझको मिले तू
तुझे पा लू मुझे किस्सा लगे है ॥

तुम्हारी बात में ऐसा असर है
ये मिट के भी मुझे पुख्ता लगे है ॥

मेरी किस्मत में चलना ही है यारो
मेरी मंजिल मुझे रस्ता लगे है ॥

तुम उससे पूछते हो दोस्तो क्या
कि वो हर बात में बच्चा लगे है ॥

भुला पाउँगा इसको'अर्श' कैसे
तुम्हारा प्यार नित सच्चा लगे है ॥

बहर १२२२ १२२२ १२२
प्रकाश'अर्श'
२२/०३/२००९

Sunday, March 15, 2009

साहित्य ,ज्ञानपीठ और गुरु देव....

कुछ बात है के हस्ती मिटती नही हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन दौरें जहाँ हमारा ॥

शनिवार की सुबह ऐसे तो 11 बजे से पहले मेरी आँख नही खुलती कभी मगर आज का ये दिवस जैसे मेरे पुरे जीवन के लिए नही भूल सकने और मिटने वाला है । हमेशा से ही ये सोचता था के हर दिन ऐसा हो के हमेशा के लिए याद रह जाए मगर ये मूलतः सम्भव नही है ,हर एक के लिए उसके जीवन में ।
मुझे इस बात का जारा सा भी इल्म नही था के साहित्य ,हिन्दी भवन ,और मेरे गुरु जी एक साथ ही मुझे मिलेंगे। जैसे ही मैं हिन्दी भवन पहुँचा गुरु जी पहले ही पहुँच चुके थे समय पे जैसे ही मैंने उनका चेहरा पहली दफा देखा धन्यभाग मेंरे कितनी सहजता से उन्होंने मुझे गले लगने पे बिवश किया मेरे चरण छूने पे ,पता नही ये कैसी तस्कीन थी उनसे गले लग के एक अलग सी शान्ति और सुकून मिला जो पहले कभी भी एहसास नही हुआ ।

जब गुरु जी को नवलेखन के लिए सभागार के सबसे अगली पंक्ति में बैठने को
कहा गया तो मैं ह्रदय से प्रफुल्लित और भाव बिभोर हो उठा इस बात का सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है के भारत जैसे विशाल देश में एक छोटे से कसबे सीहोर का वो शांत मृदुल और विनम्र स्वाभाव का ब्यक्ति साहित्य जगत में आज सबसे पहली पंक्ति में बैठा है । शायद इस बात का अंदेशा उन्हें भी नही था ।जो मंच पे या खचाखच भरे सभागार में बैठे हजारो लोग थे ।

मंच पे साहित्य जगत के बड़े-बड़े हस्ताक्षातर श्री कुंवर नारायण ,अजित कुमार, अशोक वाजपयी, श्री कैलाश वाजपयी,और सुश्री रिता शुक्रल जी आसीन थे । वो गर्व महसूस कर रहे होंगे के उनके सामने ये सरल स्वाभाव का इंसान जो बैठा है उतराधिकारी के रूप में है, उसके हाथ में हिन्दी जगत का भविष्य बहोत उज्जवल है और सुरक्षित भी ।

ईस्ट इंडिया कंपनी १५ छोटी छोटी कहानियो का संकलन है । जिसमे सारे के सारे मोतिओं के समान कहानियाँ है को गुरु जी ने पिरोया है हमारे लिए ।
साहित्य जगत में अमिट दखल रखने वाली सुश्री रिता शुक्ला जी औरज्ञानपीठ के निदेशक श्री रविन्द्र कालिया जी ने पुस्तक का विमोचन किया ऐसा लग रहा था के जैसे माँ
सरस्वती ख़ुद धारा पे आई है और उतराधिकारी को उसका राज तिलक कर रही है ,मुख्या मंत्री साहिबा थोडी देर थी तो एक बात सबको ध्यान रहे समय किसी का इंतज़ार नही करता ,हालाकिं वो आई मगर अफ़सोस जाहिर करने के सिवा उनके पास कुछ भी नही था ।आप सभी तो राजनीति, मसरूफियत और देर से आना ये सारे एक ही घडे के पानी पिने के समान है समझ सकते है।

पुस्तक विमोचन के बाद हम श्री कुंवर नारायण जी मिले और उनका आशीर्वाद लिया । साहित्य जगत और साहित्य से मेरी मुलाक़ात ये मेरी ज़िन्दगी में पहली दफा है रही थी, मैं उत्सुक था,सभी से मिलने केलिए ख़ुद गुरु वर मुझे नए और पुराने लेखको से मेरा परिचय करा रहे थे "अर्श" के रूप में ।

वहां से हम केन्नोट पैलेस में लंच लेने के लिए वही पे गुरु जी से विस्तार से बात होती रही डाईनिंग टेबल पे । फ़िर होटल गए वहां खूब गप्पे मारे , गुरु जी से सीखता रहा उनके आशीर्वचन सुनता रहा लेख और लेखनी के बा
रे में ।
शाम को थोड़ा घुमाने गए । घुमाते घूमते एक होटल में अल्पाहार लेने गए ,एक और बात है गुरु जी के सेहत से आप ये बात बिल्कुल नही कह सकते के ये इंसान खाने का खूब शौकीन है मगर सिर्फ़ शौक रखते है खाते नही ।

लौटने के बात देर रात तक होटल में बात चलती रही उनके साथ सोनू जी भी आए थे उनसे से भी मुलाक़ात हुई
। फ़िर रात्रि १२ बजे मैं वापिस आगया ताकि सुबह वाली ट्रेन में जानी है इन दोनों लोगों को तो थोड़ा आराम का भी मौका मिले कल से है इन्हे सब तो नसीब था मगर आराम नही कर पा रहे थे मेरे मिलने से और कहूँ तो उत्सुकता से मिलने को लेकर॥
गुरु जी की पहली पुस्तक को सबसे पहले खरीदने का गौरव भी मुझे प्राप्त हुआ उनके हस्ताक्षर सहित और एक और लेखक श्री रविकांत जी की पुस्तक यात्रा को भी सबसे पहले मैंने ही ख़रीदा ॥
पुस्तक प्राप्ति का पता है १८, इन्स्तितुशनल एरिया ,लोदी रोड नई दिल्ली -११०००३
मूल्य मात्र रु .१३०/-
बस एक शे'र है के ...
वो मिले बिछड़ भी गए और चुप हो रहे
जैसे मुख्तशर सी बात में सदियाँ गुजर गयी ॥

प्रकाश'अर्श'
१५/०३/२००९

Wednesday, March 11, 2009

शाम को डूबते हुए सूरज...

होली के पवन पर्व पे आप सभी को ढेरो बधाई... बस एक दिली-खाईश थी के आप सभी के सामने एक नज़्म पेशकरू... आप सभी का प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा...

सबसे पहले बादशाह शाईर जनाब बहादुरशाह जफ़र का ये शे'र

हम ही उनको बाम पे लाये,और हम ही महरूम रहे ॥
पर्दा हमारे नाम से उठा ,आँख लडाई लोगों ने...


शाम को
डूबते हुए सूरज की
नर्म और मुलायम किरणे
जब धीरे से
छूती है तो लगता है
तुम्हारी रेशमी जुल्फें
अभी -अभी
मेरे चेहरे पे सरकती हुई
गालों पे एक-दुसरे के साथ खेल रही है
तुम्हारी खुशबू जहन में
उतरते हुए कहती है
'भर लो मुझे'
और इस तरह के हवाओं से
खुशबू ख़त्म हो जाए
ये सोच के ही इक जुम्बिश सी होती है
तुम लौट आवो
ये तस्कीन वो जौक
स्वर्ग है मेरे लिए ॥



प्रकाश'अर्श'
११/०३/२००९
जुम्बिश=वईबेरेशन ,
तस्कीन=सुकून,शान्ति
जौक=स्वाद...

Thursday, March 5, 2009

आंखें दो काली ऐसे थीं मशहूर शहर में ...

परम श्रधेय गुरु देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल ,आप सबके सामने प्रस्तुत है ,आप सभीका प्यार और आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ.... आप सभी को होली की अनंत -असीम शुभकामनाएं सहित ....

बहर ... २२१ २१२१ १२२१ २१२


भरती रही वो सिसकियां देखा कोई न था ।
किस चाल से चला के ज्‍युं आया कोई न था ॥

किस मौज से खड़ा हुआ खंडहर है देखिये ।
कैसे कहूं के दिल यहां टूटा कोई न था ॥

आंखें दो काली ऐसे थीं मशहूर शहर में ।
दोनों जहां में जैसे के दूजा कोर्इ न था ॥

देता रहा वो धूप में छाया गुलों से ही ।
उस पेड़ में पलाश के पत्‍ता कोई न था ॥

मुझको तसल्लियां तो मिलीं सबसे'अर्श' पर ।
देखा पलट के जब भी तो अपना कोई न था ॥


प्रकाश'अर्श'
०५/०३/२००८

Saturday, February 28, 2009

अदब से मौत का भी सामना करे कोई ...

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी
के सामने है ... आप सभी के प्यार औरआशीर्वाद का आकांक्षी हूँ ....



ये मुख्‍़तसर सी जि़ंदगी है क्‍या करे कोई ।
है सांस आखिरी बची दुआ करे कोई ॥

घुटन है जिन्‍दगी ये फिर भी जी रहा हूं मैं ।
क्‍युं आखिरी में बात बेमजा करे कोई ॥

मिले हैं मौत से तो झूम कर के हम गले ।
बला से अपने जिन्‍दगी कहा करे कोई ॥

यकीन है वो आयेगा जरूर लौट कर ।
उसीके इन्‍तजार में जिया करे कोई ॥

कला तो सीखते हैं जिन्‍दगी की सब यहां ।
अदब से मौत का भी सामना करे कोई ॥

किसे रहे थे अर्श ढूंढ ख्‍वाब में भला ।
ये नींद टूटने पे क्‍या पता करे कोई ॥

प्रकाश'अर्श'
२९/०२/२००९


Thursday, February 19, 2009

नहीं के हमको निभाना नही आता ...

गुरु जी के आशीर्वाद के इंतज़ार में......



नहीं के हमको निभाना नहीं आता ॥
वक्त पे उनको भी आना नहीं आता ॥

जरा सी बात पे देखो वो रूठ जाते है ,
क्या कहूँ उनको सताना नही आता ॥

रस्म तो रस्म है क्यूँ घबरा रहे हो तुम ,
क्या तुम्हे रस्म निभाना नही आता .?

अभी तो आए हो जी-भर के देख तो लूँ
तुम्हे न जाने का बहाना नही आता ॥

आज का दौर है दिखावे का सुनो तुम ,
तू रह जाएगा गर दिखाना नही आता ॥

तू कहे 'अर्श'तेरे कुचे में दम निकले ,
बस ये है तुझे आजमाना नहीं आता ॥

प्रकाश'अर्श"
१९/०२/२००९

Sunday, February 1, 2009

तुम्हे रात-दिन क्यूँ मैं सोचा करूँ ...

आप सबके सामने एक गीत नज़्र कर रहा हूँ ,जो मूलतः पहली गीत है इस ब्लॉग पे मेरी ।गलती के लिए मुआफी चाहूँगा ....


तुम्हे रात-दिन क्यूँ मैं सोचा करूँ।
तेरे ख्वाब ही अक्सर देखा करूँ॥

नहीं के हमें दिल लगना नही था
गली हुस्न की हमको जाना नही था
बना के खुदा फ़िर क्यूँ सजदा करूँ ॥
तेरे ख्वाब ही .......

अभी दिल हमारा धड़कना था सिखा
तुम्हारी नज़र से बचाना किसीका
मैं जिन्दा रहूँ या के तौबा करूँ ॥
तुम्हे रात दिन ........

हमारी मोहब्बत के चर्चे है देखो
तुम्हे जानते है मेरे नाम से वो
है खाई कसम क्यूँ मैं धोखा करूँ ॥
तुम्हे रात दिन .....
तेरे ख्वाब ही अक्सर ....


प्रकाश"अर्श"
०१/०२/२००९

Thursday, January 15, 2009

ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ...

बहरे खफीफ ..............................................आशीर्वाद
२१२२-१२१२-२२....................................गुरु देव पंकज सुबीर जी

मैंने भी दिल लगा लिया यारों।
जख्म पे जख्म पा लिया यारों ॥

मौज फ़िर ज़िन्दगी नही देती ।
जख्म गहरा जो ना लिया यारों ॥

आज ना डगमगा के चल पाया ।
वादा बादे पे था लिया यारों ॥

हादसे और हो गए होते ।
ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ॥

दफ्न कर 'अर्श'लौट जाओ तुम।
रूह तो और जा लिया यारों ॥

प्रकाश'अर्श'
१५/०१/२००९
बादे=शराब ,जा=जगह ।

Sunday, January 11, 2009

रे मर जाएगा क्यूँ सोचे है ...

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल ...

कल क्या होगा,क्यूँ सोचे है
मर जाएगा, क्यूँ सोचे है ॥

खुद को तक, गिरवी रक्‍खा है
बिक जाएगा ,क्यूँ सोचे है ॥

अपना घर कितना अपना है
वो आएगा ,क्यूँ सोचे है ॥

शेर नहीं दिल, के छाले हैं
वो समझेगा ,क्यूँ सोचे है ॥

बीत गया जो, रीत गया जो
फ़िर लौटेगा ,क्यूँ सोचे है ॥

अर्श है बेबस ,इस दुनिया में
पछतायेगा , क्यूँ सोचे है ॥

प्रकाश"अर्श"
११/०१/२००९

Saturday, January 10, 2009

जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था...

उसको मेरी मोहब्बत का एतबार न था ।
मैं लौट आऊंगा उसे मिरा इंतज़ार न था॥

वो लौट आई है शहर में मोहब्बत लेकर
बचपन का प्यार शायद यादगार न था ॥

लिखती थी हथेली पे वो इक नाम हमेशा
देखा तो नाम मिरा वो गमगुसार न था ॥

पूछता रहा मैं हाल उसका औरों के हवाले
जिस दिन से उसके हाल पे इख्तियार न था॥

आया है वो भी देख लो चार अश्क बहा के
जिस मजार पे गया था वहां अश्कबार न था॥

आया हूँ कहीं और या हूँ अपने शहर में
पहले तो बागबां"अर्श"यूँ बे-बहार न था ॥

प्रकाश"अर्श"
१०/०१/२००९

Tuesday, January 6, 2009

आप ही कन्धा आप ही जनाजा ...

पुरानी रंजिश को हवा दीजे ।
फ़िर वही सूरत दिखा दीजे ॥

आज मजबूर-ऐ हालात दिल है
मर ही जाने का हौसला दीजे ॥

हाथ में चार पैसे है बचे अब
ना कहना चाँद-तारे ला दीजे ॥

मैं ग़लत हूँ मुजरिम हूँ अगर
मुझको फंदे पे लटका दीजे ॥

आखिरी ख्वाहिश भी छुपा लूँगा
आप जल्दी से दफना दीजे ॥

आप ही कन्धा आप ही जनाजा
"अर्श"कब्र का रास्ता दिखा दीजे॥


प्रकाश"अर्श"
०६/०१/२००९
आप =मैं ख़ुद ,

Sunday, January 4, 2009

सामने खड़ा है फासला है ये ...

एक बड़ा अच्छा वाकया है ये ।
वो ना समझे है क्या नया है ये ?

हम मोहब्बत में हो गए जुदा ।
लोग कहते इसे कायदा है ये ॥

देख सरगोशी है मोहल्ले में
है मिली उनको जायका है ये ॥

बह रही मुझमे वो लहू बनके
वो मेरी है बस माज़रा है ये ॥

उम्र के जैसी लम्बी हुई दूरी
सामने खड़ा है फासला है ये ॥

लोग कहते है बेवफा है"अर्श"
मैं अगर मानु तो बा-वफ़ा है ये॥

प्रकाश"अर्श"
०४/०१/२००९

Friday, January 2, 2009

ये खुश्बू जरा जानी पहचानी लगी ...

ढूँढने उनको हम जब भी निकले ।
लो दूर तक बस रास्ते ही निकले ॥

फासला बस कदम भर का ही था,
बढ़ा तो गाम फ़िर गाम ही निकले ॥

दर्द में जब आँख से आंसू ना बहे ,
पिछली दफा थे आखिरी निकले ॥

हया ने पूछा जब देखो शरमा के
हया का नाम तो हया ही निकले ॥

उम्र भर मुझको मंजिल ना मिली
मुश्किलों में चलाना यूँ ही निकले ॥

ये खुशबु जरा जानी पहचानी लगी
लगता है "अर्श"इधर से ही निकले ॥

प्रकाश"अर्श"
०२/०१/२००९

Thursday, January 1, 2009

है मुनासिब के याद-दाश्त मेरी ग़लत हो ...

वो कौन है जो मेरी तरह दिखता है ।
है मेरा अक्स या मेरी तरह दिखता है ॥

देखकर उड़ते परिंदों को दिल मेरा रोए
उड़ान तू भी तरसे तो मेरी तरह दिखता है ॥

लहू को उसके रगों का मुआयना कर लो
लहू सा है तो फ़िर मेरी तरह दिखता है ॥

मैं हूँ जो बस गैरते-साजिश में मारा गया
तू ठुकराया हुआ है तो मेरी तरह दिखता है ॥

है मुनासिब के याद-दाश्त मेरी ग़लत हो
वादा उसने किया था जो मेरी तरह दिखता है ॥

होता एहसास अगर"अर्श"अपने जुल्मों का
ना करता चर्चे अगर मेरी तरह दिखता है ॥

प्रकाश"अर्श"
०१/०१/२००९

Tuesday, December 30, 2008

दरिया है वो प्यासा है वो देखो नकाब में ...

चेहरा छुपाए रख्खा है वो देखो नकाब में ।
कातील है फ़रिश्ता है वो देखो नकाब में ॥

कत्ल करता है ऐसे के पता भी ना चले ,
जख्म देता है गहरा है वो देखो नकाब में ॥

हमसे रूठा है ये सितम है या अदा उसकी
जैसा भी है अच्छा है वो देखो नकाब में ॥

नाजुक लबों से उसके मोहब्बत की सदा सुन
जिन्दा हूँ के आया है वो देखो नकाब में ॥

मैं हूँ इस बात पे खामोश तू उसकी सब्र देख
दरिया है वो प्यासा है वो देखो नकाब में ॥

एक बेकली है जो दफ़न है"अर्श"मेरे सीने में
एक खलिश है के तड़पता है वो देखो नकाब में ॥

प्रकाश "अर्श"
३०/१२/२००८

Saturday, December 27, 2008

अगर जुन्नार और तस्बीह दोनों एक हो जाए...

कोई लकीर नही खींचते दिलों के रास्ते में ।
के हमारा घर नही बांटता मीलों के रास्ते में ॥

दोनों सरहद में बंटें है मगर यूँ गुमराह न हों
के अनपढ़ आ नही सकता काबीलों के रास्ते में ॥

मौज आएगी टकराएगी मगर ये डर कैसा
के मौज दम भी तोडे है साहिलों के रास्ते में ॥

दोनों ने तान रखा है निशाना एक दूजे पे
कोई फ़िर आ नही सकता जाहिलों के रास्ते में ॥

रगों में खून भी बहता है उसके मेरे पूर्वज का
हमारी पहचान रहे कायम तब्दीलों के रास्ते में ॥

अगर जुन्नार और तस्बीह दोनों एक हो जायें
कोई फ़िर आ नही सकता फाजिलों के रास्ते में॥


प्रकाश"अर्श"
जुन्नार=जनेऊ ,तस्बीह=मुसलमानों का जाप माला
फाजिलों= प्रवीन,श्रेष्ठ ।

Friday, December 26, 2008

मेरे हर ख्वाब को मकसद बनाये बैठी है ...

आज मैं इस ब्लॉग पे अपनी पचासवीं ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ आप सभी का स्नेह और आशीर्वाद चाहूँगा ........


उसके भी सितम ढाने की अदा खूब है ।
दूर जा जा के पास आने की अदा खूब है ॥

बैठी है महफ़िल में मगर देखो तो सही
दूर ही से नज़रें मिलाने की अदा खूब है

मेरे हर ख्वाब को मकसद बनाये बैठी है
मोहब्बत उसके निभाने की अदा खूब है ॥

रंज में रोती है बेशक रुलाती भी है मुझको
इश्क में रूठने मनाने की अदा खूब है ॥

कभी इतेफाक से मिल जाए तो शरमाके
दांतों में उंगली दबाने की अदा खूब है ॥

निगारे-नजरवान कहूँ या"अर्श"हयाते-जान
शब्-ऐ-तारिक उसके मिटाने की अदा खूब है ॥

प्रकाश "अर्श"
२६/१२/२००८

निगारे-नजरवान=आंखों में खुबसूरत दिखने वाली
शब्-ऐ-तारिक=अँधेरी रात (इसका प्रयोग ज़िन्दगी
में फैले अंधियारे से है )
हयाते-जान=ज़िन्दगी की जान।

Thursday, December 25, 2008

मैं भटकता रहा इत्मिनान से गैरों की बस्ती में ...

वो के एक रस्म निभाने पे खफा हो बैठा ।
जख्म उसी के थे दिखाने पे खफा हो बैठा ॥

तिश्नगी उसकी किस क़द्र होगी महफ़िल में
जाम टकरा के पिलाने पे खफा हो बैठा ॥

जख्म देकर हादसा बताये फिरता है मगर
वो हादसा अमलन गिनाने पे खफा हो बैठा ॥

रस्मे उल्फत जो सिखाता रहा उम्र भर मुझको
आख़िर वही रस्म निभाने पे खफा हो बैठा ॥

वो दुआ करता रहा मिल जाए खियाबां उसको
लो खिजां में फूल खिलाने पे खफा हो बैठा ॥

मैं भटकता रहा इत्मिनान से गैरो की बस्ती में
दिया जो उसको आशियाने पे खफा हो बैठा ॥

एक चेहरेमें छुपाये रखा है"अर्श"कई चेहरे
आईना उसको दिखाने पे खफा हो बैठा ॥

प्रकाश"अर्श"
२५/१२/२००८

Tuesday, December 23, 2008

घर तक आए है तमाशाइयां ...

मैं हूँ तू है, और है तन्हाईयां ।
दिल है धड़कन और अंगडाइयां ॥

मौसम भी है,कुछ दिल बेबस
दिल कहता है कर बेईमानीयाँ ॥

देखो तमाशा ना बन जाए कहीं
घर तक आए है तमाशाइयां ॥

तेरी आँखें तो है दोनों जहाँ
इस दो जहाँ पे है कुरबानीयाँ ॥

जुल्फ तेरे है यूँ घटावों जैसी
हुस्न से है तेरे रोशानाइयां ॥

तेरी नजाकत तेरी हया भी
कर देगा"अर्श"फ़िर रुस्वाइयां ॥

प्रकाश "अर्श"
२३/१२/२००८

Tuesday, December 16, 2008

वो खड़ा है मुखालिफ-सफ में ....

वो रात कभी का भुला दिया ।
जो ख्वाब जगे थे सुला दिया ॥

वो खड़ा है मुखालिफ-सफ में
इस बेदिली ने फ़िर रुला दिया ॥

जो करता रहा जुर्मो का सौदा
मुन्सफी में उसको बुला दिया ॥

रहने लगा मिजाज से आज-कल
जिस वक्त से हमको भुला दिया ॥

क्या बात थी तुम मुकर गए
किस बात पे यूँ लहू ला दिया ॥

आवो ना आजावो"अर्श"वरना
ज़िन्दगी ने दाम पे झुला दिया ॥

प्रकाश"अर्श"
१६/१२/२००८

मुखालिफ-सफ=बिरोधियों की पंक्ति
दाम=फंदा ,मुन्सफी=फैसला॥

एक शे'र खास तौर से विनय भाई(नज़र) के लिए...
लिखो सानी अब तुम नज़र
मैंने तो मिसरा उला दिया ॥

Sunday, December 14, 2008

काटों की तिजारत सा मेहमां निकला ...

मैं भी, किस दर्जे, दीवाना निकला ।
जो था मेहरबां,नामेहरबां निकला ॥

देता रहा मुझे,जो तस्सलियाँ उम्रभर
वो कहता रहा हा -हा ,ना-ना निकला ॥

जाने लगा तो ,दो -चार जख्म दे गया
देख वो नामेहरबां,मेहरबां निकला ॥

फ़िर किसी रोज,वो तड़पकर आया
मिली तस्कीन,मगर अब्ना निकला ॥

मिले थे जिस उम्मीद से"अर्श"भरम में
काटों की तिजारत,सा मेहमां निकला ॥

प्रकाश "अर्श"
१४/१२/२००८

तिजारत=खरीद-बिक्री ,अब्ना =अवसर
तस्कीन = शान्ति ॥

Saturday, December 13, 2008

दिखे है मुझे अब विरानियाँ शहर में ...

बन जाए अगर आदमी आदमी सा ।
के फितरत नहीं आदमी आदमी सा ॥

ना आंसू बहेंगे आंखों से किसी के
गर काटे कोई आदमी आदमी सा ॥

दीवाना हुआ है वो पागल भी मानों
दिखा है कोई आदमी आदमी सा ॥

कहे क्या कोई अब फ़साना ग़मों का
हँसेंगे सभी कह आदमी आदमी सा ॥

हंसीं खेल में तबाह ना कर किसी को
दिल तेरा भी है आदमी आदमी सा ॥

दिखे है मुझे अब विरानियाँ शहर में
क्या है गाँव में आदमी आदमी सा ॥

मुल्कों में ना होगी यूँ सरहद की बातें
बन जाए अगर आदमी आदमी सा ॥

वो कौन है जो कोने में सिसक रहा है
पूछो हाल"अर्श" आदमी आदमी सा ॥

प्रकाश"अर्श"
१३/१२/२००८

Thursday, December 11, 2008

बैठा हूँ दर्द की बस्ती में तजुर्बों के लिए ...

शबे-फिराक में वो कैसी निशां छोड़ गया ।
जहाँ से वो गया मुझको वहां छोड़ गया ॥

रहेगा दिल में अखारस ये उम्र भर के लिए
जिस बेबसी से वो यूँ आस्तां छोड़ गया ॥

चली जो दर्द की आंधी गर्दो-गुबार लेकर
बुझी-बुझी से राख में वो धुंआ छोड़ गया ॥

मुझे रोता, तड़पता. छटपटाता देखकर
किया एहसान मुझे मेरे मकां छोड़ गया ॥

बैठा हूँ दर्द की बस्ती में तजुर्बों के लिए
कहाँ है वैसा मौसम जो समां छोड़ गया ॥

वो मिला जीने का मकसद मिला था मुझे
वो गया"अर्श"फ़िर अहले-जुबां छोड़ गया ॥

प्रकाश "अर्श"
११/१२/२००८

Tuesday, December 9, 2008

अब रौशनी कहाँ है मेरे हिस्से ...

अब रौशनी कहाँ है मेरे हिस्से ।
लव भी ज़दा ज़दा है मेरे हिस्से ॥

गर संभल सका ,तो चल लूँगा ।
पर रास्ता ,कहाँ है मेरे हिस्से ॥

मैं भी चीखता चिल्लाता मगर ।
कई दर्द बेजुबां है मेरे हिस्से ॥

हुजूम हो खुशी का तेरी महफ़िल में ।
ज़ख्म है, बद्दुआ है मेरे हिस्से ॥

चाँद तारे जो तेरी निगहबानी करे ।
काफिला जुगनुओं का है मेरे हिस्से ॥

नही है"अर्श"मेरे नसीब ना सही ।
तेरी निगाह का, चारा है मेरे हिस्से ॥

प्रकाश "अर्श"
०९/१२/२००८
ज़दा =चोट खाया ,निगहबानी=रक्षक ,

Sunday, December 7, 2008

कुछ कम ही मिले मुझसे ज़िन्दगी के बसर में ...

कुछ कम ही मिले मुझसे ज़िन्दगी के बसर में।
आया नहीं वो, के न था , दुआ के असर में ॥

माना के मुद्दई हूँ मैं,पर इतनी तो ख़बर हो ।
क्या ज़ुल्म थी हमारी,कहो जिक्र जबर में ॥

उकता गया हूँ अब तो , मैं भी यूँ ही लेटे हुए ।
चलती रही थी नब्ज़ मेरी,डाला जो कबर में ॥

मिलाया खाक में मुझको,मिटाई हस्ती भी मेरी ।
धुन्दोगे मेरे बाद मुझको,वहीँ गर्दे सफर में ॥

वही मैं था, वही मय वही साकी थे बने तुम ।
वहीँ डूब के रह गया था मैं,बस तेरी नज़र में ॥

आयेंगे मिलजायेगे तुझे,"अर्श"नए दोस्त ।
मुश्किल ही मिले जैसा मेरे,कोई राहबर में ॥

प्रकाश"अर्श"
०७/१२/२००८

Tuesday, December 2, 2008

क्या हुस्न है क्या जमाल है ...

क्या हुस्न है, क्या जमाल है ।
खुदाया तिरा, क्या कमाल है ॥

वो सितमगर है,मगर फ़िर भी ।
पूछता वही तो ,मेरा हाल है ॥

वक्त ने तो मुझे,ठुकरा दिया था ।
उसने थामा तो,हुआ बवाल है ॥

अपना सबकुछ,गवां कर मैंने ।
वो मिला फ़िर ,क्या मलाल है ॥

इक सदा है ,मुझसे जुड़ी हुई ।
वो सदा भी,उसका सवाल है ॥

है चाँदनी में,धूलि हुई या"अर्श"
मेरी नज़र ,का इकबाल है ॥

प्रकाश "अर्श"
०२/१२/२००८
इकबाल = सौभाग्य ,

Sunday, November 30, 2008

किस्मत में मेरे चैन से जीना लिखा दे ...

वेसे तो मैं मुसलसल ग़ज़ल ही लिखने की कोशिश करता हूँ ,मगर एक गैर मुसलसल ग़ज़ल आप सबों के सामने पेश कर रहा हूँ उम्मीद करता हूँ पसंद आए........


किस्मत में मेरे , चैन से जीना लिख दे ।
दोजख भी कुबूल हो,मक्का-मदीना लिख दे ॥

जहाँ दहशत जदा हैं लोग,चलने से गोलियां ।
हर गोलिओं के नाम , मेरा सीना लिख दे ॥

मेहनत किए बगैर ,बद अंजाम से डरता हूँ ।
कुछ काम कर सकूँ,वो खून-पसीना लिख दे ॥

वो शान है उनकी ताज पे,गोरों के महफ़िल में ।
कभी शर्म आ जाए ,तो वो नगीना लिख दे ॥

जितना वो पिसेगी ,चढेगा उतना उसका रंग ।
मोहब्बत का नाम ,कोई संगे - हिना लिख दे ॥

दिखे है तेरा अक्स ,हर टुकड़े में यहाँ "अर्श"
टुटा था ,वो दिल था ,तू आइना लिख दे ॥

प्रकाश "अर्श"
३०/११/२००८
चौथा शे'र भारत के कोहिनूर हीरे के बारे में कहा गया है जो इंग्लॅण्ड के महारानी के ताज पे सुशोभित है ॥

Thursday, November 27, 2008

आज घर के एक कोने में बिखरा पड़ा हूँ मैं ....

हुई है ज़िन्दगी मेहरबान लो आबला दिया ।
मोहब्बत में हमें इनाम उसने गिला दिया ॥

आज घर के एक कोने में, बिखरा पड़ा हूँ मैं ।
यही किस्मत थी हमारी, यही सिला दिया ॥

कहती थी के करती है,मुझे टूट के मोहब्बत।
आई जो मेरे पास तो, मुझे इब्तिला दिया ॥

कभी फुरकत की बात पे,कहा चुप करो जी तुम ।
जाने लगी तो उम्र भर ,का फासिला दिया ॥

सी - सी के पहन लूँगा, वही चाके - कफ़न मैं ।
जिस नाज़ से"अर्श"तुने खाक में मिला दिया ॥

प्रकाश "अर्श"
२७/११/१००८

इब्तिला =पीडा,कष्ट । आबला =छाला

Sunday, November 23, 2008

इक हर्फ़ में हमने अपनी जिंदगानी लिख दी ...

इक हर्फ़ में हमने अपनी जिंदगानी लिख दी ।
हाय तौबा, हुआ फ़िर जो नादानी लिख दी ॥

वो समंदर है उसको इस बात का क्या ग़म ,
आंखों से जो बह निकले ,पानी- पानी लिख दी ॥

था कच्ची उमर का मगर था मजबूत इरादा ,
लहू के रंग से नाम उनकी आसमानी लिख दी ॥

नवाजा था उसने, के जाहिल हूँ ,मैं जालिम हूँ
मोहब्बत का करम था हमने मेहरबानी लिख दी ॥

हुई जो चर्चा अपनी मौत की ,जनाजे से दफ़न तक ,
किया था कत्ल ,मगर वक्त पे कुर्बानी लिख दी ॥

रहने दो, इत्मिनान से अब ऐ मेरे रकीबों ,
कुछ नही है मेरे पास,"अर्श"को जवानी लिख दी ॥

प्रकाश "अर्श"
२३/११/२००८

Saturday, November 22, 2008

चल लौट चलें "अर्श" वहीँ अपने अब्तर में .....

ये कहाँ आ गया हूँ मैं , दीवानों के शहर में ।
हर वक्त खटकता हूँ यहाँ सबके नज़र में ॥

लिखता हूँ गर कोई ग़ज़ल होती न मुक्कमल ,
होती है ग़लत रदीफ़,काफिये में बहर में ॥

सब है अपनी धुन में, मतलब ही नही किसी को ,
कैसा है यहाँ चलो-चलन अपने -अपने घर में ॥

किया जो इज़हारे मोहब्बत, मैंने किसी से ,
टाला है वहीँ ,उसी ने ,बस अगर-मगर में ॥

होती हो तिजारत अगर मोहब्बत पे मोहब्बत ,
मैं भी खड़ा हासिये पे यहाँ सिम-ओ-जर में ॥

नही करनी मोहब्बत मुझे, न होगी ये मुझसे ,
चल लौट चले "अर्श"वही अपने अब्तर में ॥

प्रकाश "अर्श"
२१/११/२००८

अब्तर =मूल्यहीन,

Thursday, November 20, 2008

तेरे दिल से मेरे दिल का रिश्ता क्या ...

तेरे दिल से ,मेरे दिल का रिश्ता क्या ।
तू मिलती, ना मैं मिलता, फ़िर मिलता क्या ॥

सोंच रहा ,क्यूँ तेरा ऐसे नाम लिया ,
याद है अब भी भूलता फ़िर तो भूलता क्या ॥

वो फलक जो दूर तलक जा मिलता है ,
जाता मैं तो वो वहां फ़िर मिलता क्या ॥

याद है आब भी तेरी सांसों की गर्माहट ,
राख हुआ था जलने को अब जलता क्या ॥

वर्षो पहले एक चमन होता था अपना ,
एक भी फुल अब "अर्श"वहां है खिलता क्या ॥

प्रकाश "अर्श"
२०/११/२००८

Sunday, November 16, 2008

हाजीरी लगाई मैंने फ़िर इकरार कर लिया ..

उनसे नज़र हमने, इस तरह मिला लिया ।
हाय अल्लाह क्या कर दिया, ये क्या कर लिया ॥

आई जो बात ,अपनी मोहब्बत की अस्हाब ,
उसने ना कोई दिल लिया, न कोई जिगर लिया ॥

देखा था, इस अंदाज़ से उसने मेरी तरफ़ ,
रहमत खुदाया तेरा था के तीरे-जिगर लिया ॥

लोगों ने पूछा जब ,मुन्सफी में उसका नाम ,
आशुफ्ता खुदा का नाम हमने उधर लिया ॥

रोका जब उस तरफ़ से, रास्तों ने मेरा हाथ ,
हाजीरी लगाई मैंने, फ़िर इकरार कर लिया ॥

मुझको भी अब बता दो दीवानों के अस्मशान ,
ख़ुद ही कब्र खोद लिया" अर्श" ख़ुद ही गुजर लिया ॥


प्रकाश "अर्श"
१६/११/२००८
अस्हाब =स्वामी ,मालिक,
आशुफ्ता =घबराहट में ,

Saturday, November 15, 2008

उनको नायाब देखा है ....

इक अजीब खाब देखा है ।
उनको नायाब देखा है ॥

बड़ी मुश्किल में हूँ ,
ये क्या जनाब देखा है ॥ ,

वहीँ छलके है फकत ,
उम्दा शराब देखा है ॥

मुझे भी मिलेगा
क्या
,वो अजाब देखा है ॥

उनके जमाले रुख पे ,
कैसा आफताब देखा है ॥

अर्श डूब गया हूँ मगर,
ताब को ताब देखा है ॥


प्रकाश "अर्श"
१५/११/२००८

Thursday, November 13, 2008

सुना है इश्क में नज़रें जुबान होती है ...

उनकी हर लफ्ज़ में मोहब्बत जवान होती है ।
वो होती है, तो महफ़िल में जान होती है ॥

उनके आँचल के तले नींद में उन्घी सी ख्वाब
जागती है, तो मुक्कमल सयान होती है ॥

है वो मुमताज़ की जागीर ,मगर सोंचों तो सही
उनकी चर्चे भी ,ताजमहल की शान होती है ॥

वो भी चुप है ,मैं भी कुछ कह नही पाता
सूना है ,इश्क में नज़रें जुबान होती है ॥

वो सोंच ले ,जो फकत उंगली उठाना जानते है
उनकी अपनी भी तो"अर्श" गिरेबान होती है


प्रकाश "अर्श"
१३/११/२००८

करता है फ़िर गुनाह क्यू रब भी कभी कभी ..

आती है उनकी याद अब भी कभी कभी ।
मिलता हूँ अपने आप से जब भी कभी कभी ॥

रहती थी ,परेशान वो, चेहरा छुपाने में
उतारता था जब नकाब सब भी कभी कभी ।

आई न, नींद उम्र भर इसी, इंतजार में
लगता है आ रही है वो अब भी कभी कभी ॥

लिखता था ख़ुद जवाब, मैं अपने सवाल का
देती न थी, जवाब वो तब भी कभी कभी ॥

हमने क्या बिगाडा "अर्श" के हम बिछड़ गए
करता है फ़िर गुनाह क्यूँ रब भी कभी कभी ॥

प्रकाश "अर्श"
१३/११/२००८

Monday, November 10, 2008

ग़म, आंसू , दर्द .....

ग़म , आंसू , दर्द

यही सारे है

हमदर्द मेरे ।

मिले हैं मुफ्त तो

मुझको

सस्ती - सस्ती तन्हाई ॥

मेरा खजाना तुम गर पूछो

बस उम्र- भर

की

बेवफाई




प्रकाश "अर्श "
१०/११/२००८

Sunday, November 9, 2008

नहीं सियाह तो समंदर पे हुकूमत होगी ....

नहीं सियाह तो समंदर पे हुकूमत होगी ।
मिलेगी वो मुझे अगर मेरी किस्मत होगी ॥

अभी से हार के क्यूँ बैठ जायें खुदा से ,
मिलेंगे लोग वही जब दोजख जन्नत होगी ॥

बहोत कठिन है, यकीनन ये राहे -मोहब्बत ,
करेंगे पार, अगर हौसला हिम्मत होगी ॥

नहीं हैं सीरी -फ़रहाद ,कैस से बड़े हम
मिलेगी हमको भी उकुबत जो उकुबत होगी ॥

वज्म में आना तुम भी, ओ मेरे रकीबों
करेगा "अर्श" खिदमत जो खिदमत होगी ॥


प्रकाश "अर्श"
९/११/२००८

खुदा = मोहब्बत के ठेकेदार, उकुबत = सज़ा ,
खिदमत = सेवा ,आवभगत । बज्म = सभा ,
कैस = मजनू ,रकीब = दुश्मन .................,

Friday, November 7, 2008

मुझको मुज़रिम न बनावो खुदा के लिए...

उठे हैं जब भी ये हाँथ , तो दुआ के लिए
मुझको मुज़रिम न बनावो खुदा के लिए ॥

किस तरह उनसे कहूँ के, नही है मेरा कसूर
कोई लफ़्ज़ ही नहीं है अब जुबां के लिए

कुछ तो एहतियात करो ,ऐसे ना करो तुम
मान भी जावो मेरा कहा खुदा के लिए ॥

आए नही हो तुम ,जब भी किया वादा
अच्छा था इंतजार वो तजुर्बा के लिए ॥

अकबर बना है "अर्श" वो जिसने किया गुनाह
कोई नही है अत्फ़ यहाँ बे-जुबां के लिए ॥

प्रकाश "अर्श"
७/११/२००८

अकबर = महान , अत्फ़ = दया ,कृपा

Wednesday, November 5, 2008

देखो अब ज़माना भी तेरे मेरे साथ है ...

की जो किसी ने, मुझसे मेरे जिक्र-हयात की ।
आया जुबां पे, नाम तेरा तौबा ज़मात की ॥

महफूज़ है, अब भी वहीँ ,तेरी वफ़ा की जा
कैसे भुलाऊं बात वो पहली मुलाकात की ॥

आया वो, आके लौट गया मेरे गोर से
मुश्त-ऐ-खाक डाल न सका, रवायत की ॥

देखो, अब ज़माना भी तेरे- मेरे संग है
इनको भी मिली है खुशी अपने निजात की ॥

एक ही खंज़र है "अर्श"दोनों के सिने में
लोगों ने मुन्शफी की, है ये हादिसात की ॥

प्रकाश "अर्श"
५/११/२००८
जिक्र -हयात =जिंदगी की चर्चा
ज़मात=इकठी भीड़ ,मुन्शफी =फैसला
मुस्त-ऐ-खाक =एक मुठी मिटटी ,
हादिसात = दुर्घटना ॥ गोर= कब्र

Sunday, November 2, 2008

अपने ही घर में आए है हम मेहमान की तरह.....

अपने ही घर में आए हैं हम मेहमान की तरह ।
हमसे भी पूछा हाल-ऐ-दिल अंजान की तरह ॥

सबको लगाया उसने गले जी बड़े तपाक से ,
हमसे मिलाया हाथ भी तो मेहरबान की तरह ॥

ऐसी बेकली तो कभी जिन्दां में भी ना हो ,
जिन्दां में हूँ जिन्दा तो बस अह्जान की तरह ॥

चिलमन के उस तरफ़ से जो देखा था एकबार ,
शायद दिखा रहे थे हम भी नादान की तरह ॥

हमको निकाल देते "अर्श" गर बे-तमीज थे ,
हमको बुलाया है तो मिलो इंसान की तरह॥


प्रकाश "अर्श'
२/११/२००८

जिन्दां= कारागार ,बंदीगृह ॥ अह्जान = दुःख से ॥

Saturday, November 1, 2008

तेरा मिलना मुझसे कहना काश के आप हमारे होते

कितनी अच्छी, बात ये होती, तुम जो गर हमारे होते ।
हुस्न भी होता, इश्क भी होता, सूरज चाँद सितारे होते ॥

तेरी बातें ,तेरा हँसना, तेरी वो खामोश ईशारे
तेरा आना ,तेरा जाना ,मैं तेरा तुम हमारे होते ॥

मेरी धड़कन, मेरी सांसे, मेरी हर एक आह तुम्हारी
तेरा मिलना, मुझसे कहना, काश के आप हमारे होते ॥

थोडी सी घबडाहट होती, थोड़ा सा शर्माना होता
तेरी तरफ़ जो देखता मैं फ़िर आँचल के वो किनारे होते ॥

तेरी आंखों के मैखाने ,तेरे होंठों के प्याले से "अर्श "
होश में हूँ बस ये कह लेता, होश कहाँ हमारे होते ॥

प्रकाश "अर्श"
१/११/२००८

Sunday, October 26, 2008

एक बस तू ही नही मुझसे खफा और भी हैं .......

एक बस तू ही नहीं मुझसे खफा और भी है ।
इक मोहब्बत के सिवा वादे-वफ़ा और भी है ॥

चोट खाया, तो समझ आई, के मुज़रिम हूँ मैं
दिल ने फ़िर मुझसे कहा देखलो जा और भी है ॥

तुझे अज़ीज़ है सिम-ओ-जर तो मुबारक हो तुझे
तुमसे गिला क्या करें जहाँ मेरे सीवा और भी है ॥

मैं हूँ महरूम ,मरहूम ,मरहम न लगा "अर्श"
सोंच लो जुल्म-ऐ-मोहब्बत की सजा और भी है ॥

"अर्श"
२६/१०/२००८
सिम-ओ-जर=धन दौलत ,जा = जगह

Wednesday, October 22, 2008

बहोत बेसब्र है ये दिल बड़ी बेकरारी है ......

बहोत बेसब्र है ये दिल बड़ी बेकरारी है ।
बेदाद-ऐ -इश्क था मुझपे अब किसकी बारी है ॥

वही जुस्तजू लिल्लाह वही है आरजू कसम से
लगी है गुफ्तगू होने के वो आबरू हमारी है ॥

गम-ऐ- हयात की नुमाइश अब क्या करे कोई
सब्र है तुम हमारे हो और दुनिया तुम्हारी है ॥

खुला जब बंद-ऐ-नकाब-ऐ-हुस्न वो साकी
तल्खी-ऐ-काम-ओ-दहन उसकी है या तुम्हारी है ॥

मैं कहाँ जाऊँ अफ्सुं-ऐ-निगाह के सिवा
वही हाइल है हमारी "अर्श"वही चारागरी है ॥


बेदाद-ऐ-इश्क =मोहब्बत का जुलम ,
गम-ऐ-हयात =दुःख भरी ज़िन्दगी ,
बंद-ऐ-नकाब-ऐ-हुस्न =प्रेमिका के नकाब के बंधन
तल्खी-ऐ-कम-ओ-दहन=ओठ और तालू पर महसूस
होने वाला कसेलापन । अफ्सुं-ऐ-निगाह = जादू भरी निगाह
हाइल = बाधा पहुँचने वाला
मुआफी चाहता हूँ ज्यादा उर्दू और फारसी का शब्द इस्तेमाल करने के लिए ॥


प्रकाश "अर्श"
२२/१०/२००८

Wednesday, October 15, 2008

दिल जार - जार था ..................

दिल जब उधर से लौटा तो वो जार-जार था ।
उनको तो शायद और किसी का इंतजार था ॥

वो शोखी चहरे पे ऐसी के ज़माने फ़िर कहाँ ।
उनके गिले होंठ ,वो हिना-ओ-रुखसार था ॥

खुली थी जुल्फ ,था बदन जैसे संगेमरमर ।
तिरछी नज़र का तीर यहाँ तो आर-पार था ॥

वो परी थी, या कोई हूर थी ज़मीं पे उतरी ।
हुस्नो-शबाब का उनपे तो यो भर-मार था ॥

आफत हुई है "अर्श" अब तो जीना मुहाल है ।
दिल पे अब अपने कहाँ इख्तियार था ॥


प्रकाश "अर्श"
१४/१०/२००८

हिना-ओ-रुखसार = गलों पे छाई लाली ।

Tuesday, October 14, 2008

बड़ी अदब से मुझको आजमाने लगे .....

वो दुश्मनी इस कदर निभाने लगे ।
दूर जाते -जाते पास आने लगे ॥

दिलो-दिमाग से जिसको निकालना चाहा
हुजुर बनके वो जहन में छाने लगे ॥

मेरी मोहब्बत भी मुक्कमल हो गई होती
बड़ी अदब से मुझको आजमाने लगे ॥

वो मय था शराब था जो कल तलक
मैखाने में वही आने - जाने लगे ॥

जो ग़लत था तौबा किया था लोगों ने
आज वही गीत वो गुनगुनाने लगे ॥

बड़ी अदब से जब कहा खुदाहाफिज़ "अर्श"
जो कहने में शायद हमें ज़माने लगे ॥

प्रकाश "अर्श"
१४/१०/२००८

Wednesday, October 1, 2008

वक्त ने उनको मोतारमा बना दिया .....

वक्त ने उनको मोहतरमा बना दिया ।
खुदाया तुमने भी किसको क्या बना दिया ॥

घर से निकला था जो , तकमील के लिए ,
रास्तों ने पैरो में आबला बना दिया ॥

मुझे गुरुर था, बज्म-ऐ-नाज़ पे मगर ,
उस शख्स ने,दार-ओ-रसन जा बना दिया ॥

हाँथ मलता रहा वो उम्र भर ,आखरस
खून को "अर्श" वही रँगे-हिना बना दिया ॥

प्रकाश "अर्श"
०१/१०/२००८
तकमील = मंजिल पे पहुँचना, आबला =छाला ,
रँगे-हिना =मेहंदी का रंग , बज्म-ऐ-नाज़ = माशूक की महफ़िल
दार-ओ-रसन = सूली और फंसी का फंदा , जा = जगह ॥

Wednesday, September 17, 2008

ये कैसा कसाई था वो ...................

हाँ,वो ब्लू कमीज और काले रंग का पैंट पहन रखा था। यही पूछा था मेरे से ठाणे से किसी सिपाही ने अपने कांफिर्मेशन के लिए ॥ मेरे हाँ के जवाब में उसने मुझे ठाणे बुलाया कहा आपके दोस्त का दुर्घटना हो गया है। उसकी अकाल मृत्यु की ख़बर पते ही जैसे मेरे पैरों टेल ज़मीं निकल गई ॥ अपनी मोटर साइकिल चलाते वाक्क्त मेरा भी हाँथ कांप रहे थे ,किसी तरह से जब वहां पहुँचा तो सारी बातें साप्ह हो गई । ठाणे के सभी लोग काफी सहयोगी जैसे वर्ताव कर रहे थे सबसे ज्यादा साहिबाबाद ठाणे के सब-इंसपेक्टर तिलक चाँद जी जो शायद हमारे परेशानियों से अवगत थे काफी सहयोग दिया उन्होंने । ये वही शख्स था जिससे दोस्ती मेरी पहली दफा मैनेजमेंट कॉलेज में दाखिला के वक्ता हुआ था वो भी डेल्ही जैसे शहर में पहली दफा आया था बात चलते कहते वो मेरे अपने शहर के तरफ़ का ही निकला बहोत सारे सपने थे दोनों के आँखों में मगर अपनी अपनी जगह पे थे ॥ उसे अपनी बड़ी बहन की शादी के लिए लड़के धुन्धने थे वो बहोत बारी मेरे से इस बारे में चर्चा करा करता था । उसका एक छोटा भाई था जो एरोनोतिला इंगिनिओर था यही था मगर दोनों साथ नही रहते थे । उसका छोटा भाई जब भाई हमारे पास आकर अपने रूम पे जाता पैर छू के वो प्रणाम करता था। हम दोनों में काफी बरी झगरे भी होते थे मगर वो भी गुस्सा सारे पानी के बुलबुले की तरह होती थी । अक्सर हम भविष्य की रुपरेखा तैयार करते थे । हमने एक कंपनी भी सोंची थी खोलने की मगर वो खवाब अधुरा रह गया॥ अभी उसके देहांत के लगभग मुश्किल से १६ दिन ही हुए थे मेरी आँखे और मेरे कान भरोषा नही कर प् रहे थे जो मैंने सुना था॥ वो अक्सर मेरे ग़ज़लों को सुनता था और सराहा करता था ,हाँ मगर वो सबसे बड़ा मेरा आलोचक भी था ,मुझे अच्छा भी लगता था ॥ उसकी अन्तिम बिदाई में भी मुझे इतना दुःख नही हुआ जब मैंने मानवता कान ऐसा गन्दा खेल देखा शायद उस वक्त वो उसे पानी के लिए नही पूछा रहा होगा जब वो कराह रहा होगा उसे तो उसके बटुए की पड़ी थी जिसमे उसके कार्ड्स थे । हमने सोंचा लोग कितने अच्छे है मगर मेरा दुःख उस समय और ज्यादा बढ़ गया जब उसके मृत्यु कोई १६ दिन बाद ही उसके क्रेडिट कार्ड कां बील आया । वो भी स्वपे उसके मृत्यु के दो दिन के बाद किया गया था । मेरी ऊपर वाले से यही प्रार्थना है के मेरे दोस्त के आत्मा को शान्ति दो और उस शख्स को इतनी बरकत दो जिसे ये जरुरत पड़ती है के वो किसी का मरने का वेट करे और उसका बतुया उठाये और अपना जीविका चलाये॥ मैंने कसैओं के बारे में तो सुना था मगर ये कौन था ...


हमेशा उसके स्मृति में

प्रकाश "अर्श"

१७/०९/2008

Saturday, August 30, 2008

हज़ार बातें कही थी तुमने.......

हज़ार बातें कही थी तुमने
हज़ार खावोहिश दबी है दिल में
वही मोहब्बत , वही आरजू है
जो खवाब आंखों में दिखाई थी तुमने॥

हमारे दिल का ,वो एक कोना
कोई काट कर ले जा रहा है
वही जिन्दा बचा था
अबतक
जिसको ज़िन्दगी दिखाई थी तुमने ॥

मोहब्बत सज़ा है
मैं मान लेता
मगर साँस कायम है
अबतक उसी से
हज़ार बातें कही थी तुमने
हज़ार खावोहिश दबी है दिल में
वही मोहब्बत, वही आरजू है
जो खवाब आंखों में दिखाई थी तुमने ॥

प्रकाश "अर्श"
३०/०८/२००८

Saturday, August 23, 2008

तुम जो कर रहे थे अभी ......



तुम जो कर रहे थे अभी ,क्या वो काम बाकी है ।
हो गया बदनाम बहोत ,बस थोडी नाम बाकी है ॥

फुर्सत मिले तो फ़िर से इस तरफ़ चले आना ,
गर्दिश में हूँ,तलब है,आखिरी अंजाम बाकी है ॥

जो भी था पास मेरे वो बाँट दी ज़माने में ,
तुम भी आवो,ले जावो ,तुम्हारा इनाम बाकी है ॥

वो कौन था जिसने खोदी थी कब्र की मिट्टियाँ ,
उससे कहो ठहरे अभी ,बस थोडी काम बाकी है ॥

खुदा भी सोंच के गुम है ,ये किसका ज़नाजा है ,
जहाँ हसीनाएं शामिल है ,क्या वहां इंतकाम बाकी है ॥

मैं पी के लड़खाधाया भी नही और तुमने "अर्श"
कहदिया रिंद कोई और है ,ये उसका जाम बाकी है ॥

प्रकाश "अर्श"
२३/०८/२००८

Monday, August 18, 2008

कैसे कहूँ के फकत वाक्य हो तुम.....

कैसे कहूँ के फकत वाक़या हो तुम ।
मुझसे कोई पूछे भला क्या-क्या हो तुम॥

जो हो सका ना , मिल सका मुझको ,
वही सज़दा मेरी वही खुदा हो तुम ॥

नही है रोशनी मेरी मुक्कदर में ना सही ,
मैं जानता हूँ एक जलती हुई चरागा हो तुम ॥

शुर्ख होंठो पे तब्बसुम की बिजलियाँ ,
ये भरम है,चाँद तारों का हिस्सा हो तुम ॥

अजीब शख्स है ,फकत हँसता रहता है ,
गर खफा हो तो कह दो के खफा हो तुम ॥

"अर्श" पि के होश में आया न उम्र भर ,
वही मय हो वही मयकदा हो तुम ॥


प्रकाश "अर्श"
१७/०८/२००८

Tuesday, August 5, 2008

मुझको भी मिले प्यार तेरा जरुरी तो नही.....

मुझको भी मिले प्यार तेरा जरुरी तो नही ।
ऐसा हो इंतजार तेरा जरुरी तो नही ॥

दिल हमारा धड़कता है, तो अपनी मर्जी ,
दिल हो बेकरार तेरा जरुरी तो नही ॥

वो इक शख्स जो बैठा है अंजुमन में तेरे
मुझको हो दीदार तेरा जरुरी तो नही ॥

तुम्हारी जित में मिली है जिंदगी की खुशी ,
हो अबके हार तेरा जरुरी तो नही ॥

उम्र भर दिल को संभाले रखा "अर्श" तुमने
हो अब भी इख्तियार तेरा जरुरी तो नही ॥

प्रकाश "अर्श"
०५/०८/०८

Sunday, August 3, 2008

मुझसे मेरी जिंदगी का हिसाब .......

मुझसे मेरी जिंदगी का हिसाब मांग लो ।
कतरा कतरा पीता रहा मैं वो शराब मांग लो ॥

हर एक वरक पे लिखा है बस नाम तुम्हारा ,
ये वही किताब है ये किताब मांग लो ॥

कभी नफरत,कभी राहत, कभी नासेहा बना
वो एक शख्स है उसका आदाब मांग लो ॥

दस्ते-सहारा में जो लेके आया था चिराग ,
वो राहबर है मेरे पास लो जवाब मांग लो ॥

मैं मर भी जाऊँ मगर मुझसे न पूछना "अर्श"
जो भी करनी है अभी करलो ,हिसाब मांग लो ॥


प्रकाश "अर्श"
०३/०८/०८

नासेहा - उप्देसक ,दस्ते-सहारा =रेगिस्तान की रत,राहबर =रास्ता दिखानेवाला ॥

Saturday, August 2, 2008

साँस बाकि है अभी ......


साँस बाकि है, अभी जिंदगी का भरम रहने दो ।
वो आएगा मुजस्सम ,दिले -खुशफहम रहने दो ॥

डूब जाऊंगा ख़बर है , मगर हूँ सब्र-तलब ,
पार हो जाऊंगा ,यकीं है वो करम रहने दो ॥

किस्तों-किस्तों में कमाया है मैंने दर्द की जागीर ,
मुझे अजीज है वो ,मेरे पास मेरे गम रहने दो ॥

कल दफ़न कर देना मुझको , ऐ दोस्त मेरे ,
इतनी भी जल्दी है क्या ,थोडी शरम रहने दो ॥

टूट जाए न वादा जो निभाना था तुझे 'अर्श ' ,
आ भी जावो मेरे पास , वो कसम रहने दो ॥


प्रकाश 'अर्श '
०२/०८/०८
मुजस्सम =परिपूर्ण ,दिले-खुशफहम =दिल की खुशी ,सब्र -तलब =आस्वस्थ ....

Wednesday, July 30, 2008

जिंदगी तुझसे कोई वादा....

जिन्दगी तुझसे कोई वादा निभाना तो नही था ,
मौत आई है, खड़ी है, कोई किस्सा सुनना तो नही था ॥
लम्हों की जागीर लुटाकर हम चल दिए ,
इस दीवाने को दिल से कभी लगाना तो नही था ॥
तू फकत मुझसे मिली होती तो कोई और बात थी ,
मौत को साथ लिए मुझसे मिलाना तो नही था ॥
तमाम शहर आज इक शक्श के जनाजे में गया था ,
ख़बर ये है के वो शक्श मुझसा दीवाना तो नही था ॥
फलक के पार कोई और शहर बसती है "अर्श "
उस इक शहर का खवाब मुझे दिखाना तो नही था॥
प्रकाश "अर्श"
३०/०७/२००८

Sunday, July 27, 2008

जब यादे लौटके आई तो थी भीगी भीगी सी ...


मैं तनहा बैठा था ,
जब यादें लौट के आई तो थी
भीगी भीगी सी....
सर्द हवा की थरथराहट
और नर्म रजाई की गर्माहट थी उसमे
सर्दी की सुबह ओश
में थी
भीगी भीगी सी....
मैं चाय के प्याले से
निकले वास्प से
एक धुंधली तस्वीर बना डाला
वही तेरी छोटी - छोटी
सी ऑंखें थी
भीगी भीगी सी.....
वही मासूम चेहरा
सुनसान रस्ते पे दूर तलक दिखा
पास आया तो लैब थर्रा उठे
कुछ कह पते की तब तक
यादें जब आई तो थी
भीगी भीगी सी.....
मैं केसे कह दू की
तुम मेरी तक़दीर हो
मगर
तुम्हारी पहली छुआन
मुलायम हांथों से मेरी
हथेलिओं पे जो कुरेदा तुमने
बस लौट के आई तो थी
भीगी भीगी सी.....
सूखे साख पे वो
आखिरी आधी हरी पत्ती
जिंदगी की उम्मीद कर बैठा
वक्त भी खामोश था
दुया जब वापस लाउत आई तो थी
भीगी भीगी सी ....
तेरे सांसो की खुशबु
से अब भी तर है जहाँ अपनी
मैं अब भी खामोश हूँ
धडकनों से बस बात करता हूँ
सोंचता हूँ
वो तेरा झूम के गले लगना
पहली दफा
जब लौट के आई तो थी
भीगी भीगी सी .....
वो बरसात की रिमझिम फुहार
एक आँचल में मुश्किल से
दोनों के छुपाना
तेरे गले पे एक बूंद का ठहर जाना
यादें लौटके आई तो थी
भीगी भीगी सी....

प्रकाश "अर्श "
२७/०७/2008

Sunday, July 13, 2008

वो गिरफ्ते-ग़म की ....

वो गिरफ्ते - ग़म की नुमाइश हो जाए ,
ऐ जिंदगी फ़िर तेरी आज़माइश हो जाए॥

वो मुज्जसम सी बेखुदी की कसम ,
उम्र बाकि है अभी कोई ख्वाइश हो जाए ॥

गर्मी-ऐ-हसरते -नाकाम में जल गए होते ,
खुदानुमाई की नुमाइश हो जाए ॥

वो जो बे-नज़र,बे - जुबान खड़ा है "अर्श"
कुछ करो की उनकी सिफारिश हो जाए ॥

प्रकाश "अर्श "
१३/०७/ 2008

Friday, July 11, 2008

कितने दिन और बचें है.......

कितने दिन और बचें है जिंदगी में मेरे ,
मैं करके बैठा हूँ हिसाब दिल्लगी में मेरे॥

मैं हूँ एक शर्त ,लगावो हार भी जावो अगर,
मुझको ना होगा कोई गम है सादगी में मेरे ॥

वो आयेंगे ,ना आयेंगे इसी तलातुम में हूँ ,
देखता हूँ क्या असर है बंदगी में मेरे ॥

टुकडो टुकडो से बनाई थी एक तस्वीर "अर्श" ने ,
वो आशना भी दूर खड़ा है अजनबी में मेरे ॥

प्रकाश"अर्श"
२४/०५/2008

Thursday, July 3, 2008

वो आधी चादर.......

कहने को तो है सारा जहाँ मेरा,
ये ज़मीं मेरी ये आसमान मेरा॥

में थक के बैठा हूँ सोंचता हूँ तनहा,
बहोत देर होली,अब होजा अँधेरा,
मिले चंद पैसा तो लेलूं मैं राशन,
पकाऊं कहाँ मैं ,ना है कोई चुल्हा,
बस पी लूँ , घूंट पानी तो मिटे भूख सारा,
बिछा लूँ में चादर वहीँ फुटपाथ पर,
सो जाऊँ तानकर मैं वही आधी चादर,
कहने को तो है सारा जहाँ मेरा।
ये ज़मीं मेरी ये आसमान मेरा॥

कड़ी धुप में भी वो तोड़ती पत्थर,
चूडियों की खनक पे वो अब भी है दीवाना,
बगल में है रोता चिल्लाता ,वो छोटा माँ माँ,
छाती से लगाती वो कहती है, चुप हो ले
आँचल से छुपाती,तो वही फटी आँचल
कमाए की कहती है पुरी कहानी ,
वो उठ कर ओढ़ता है फ़िर वही अधि चादर,
कहने को तो है सारा जहाँ मेरा,
ये ज़मीं मेरी ,ये आसमान मेरा॥

वो है कैसे जिन्दा इस ऐसे शहर में ,
जो है लंगडा ,लुल्हा,गूंगा और बहरा,
मेरा हाँथ पैर तो सलामत है लेकिन ,
अमीरी गरीबी का है खेल सारा ,
कोई तो गरीबी मिटा दो ,मिटा दो यहाँ से
यही एक ख्वाब है मुझ जैसे गरीब की ,
फ़िर सो जाऊँ तानकर वही अधि चादर,
कहने को तो है सारा जहाँ मेरा ,
ये ज़मीं मेरी ये आसमान मेरा ॥


प्रकाश "अर्श"
०२/०७/2008

Tuesday, July 1, 2008

मेरी अंदाजे-नवां तुम हो..........

मेरी मोहब्बत की वफ़ा तुम हो ,
मेरी बंदगी, मेरी दुआ तुम हो ॥

हर एक वरक पे है दास्ताँ हमारी ,
मैं सब हूँ मेरी वाक्या तुम हो ॥

आज हरतरफ दिख रही है खामोशी,
शुक्र है में हूँ,मेरी जुबान तुम हो ॥

तुम हटाना ना रूख से परीशां जुल्फें ,
मैं मर ही जाऊंगा यूँ नशा तुम हो ॥

मैं दुआ करूँ मगर हर्फे-दुआ काया हो ,
"अर्श"जब कहे मेरी अंदाजे-नवा तुम हो ॥

प्रकाश "अर्श"
०१/०७/2008