घोर आश्चर्य प्रफूलित और अपने आप पे गर्व महसूस कर रहा था मैं दिल ही दिल उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दे रहा था । और एक और सुबह जो जिंदगी में कभी ना भूल पाने वाली हो गई क्युनके मैं हमेशा कहता हूँ के हर दिन नही भूल पाने वाला दिन हो ये मुमकिन नही होता।और ये आज का दिन बड़े भाई के नाम कर दिया मैंने भी . हो सकता है इस पुस्तक को सबसे पहले पाने वाला शायद मैं बन गया जैसी की मेरी दिली खाहिश थी।
बस बिस्तर पे बैठे बैठे ही इस पुस्तक को पढ़ना शुरू कर दिया,जितने दिल के धनी वो है उसके क्या कहने पुस्तक को समर्पित किया है आपने माँ को मैं ये सवाल करता हूँ उनसे के ये सभी माये देखने में एक जैसी क्यूँ होती है ?
मैंने कभी उन्हें देखा नही मगर मेरा नमन है उनको।
माँ के तस्वीर के निचे बिखरे हुए पाँच मोती है क्रमशः गीत ,छंद मुक्तक कविताएं ,ग़ज़ल, मुक्तक और फ़िर क्षणिकाएं क्रमागत रूप से जैसे पुरी तरीके से माँ को समर्पित। इस भावविशेष पे उन्हें बधाई ॥
मैं पांचो को थोड़ा थोड़ा करके बताऊंगा ...
कल तक लोग सामील लाल जी के हास्य स्वरुप को देखा होगा और ख़ुद मैं भी उनके इसी स्वरुप से परिचित था मगर वो इस तरह के गंभीर विषय पे लिख सकते है या ये गंभीर स्वरुप भी उनका है ये समझ नही पाया था !!! चलिए मिलते है उनके कई स्वरुप से ..
गीत :- अपनी माता जी को समर्पित इस गीत के बारे में क्या कहने
सूरज क्यूँ इतना तपता है

मेरा अंग अंग जलता है
पहले सा सूरज लगता है
पर कितनी तेज चमकता है
मेरी चाट न जाने कहाँ गई
छाँव पाने को दिल मचलता है
माँ ! तू जबसे दूजे जहाँ गई
ये घर बिन चाट का लगता है
पहले सा सूरज लगता है
पर कितनी तेज चमकता है
मेरी चाट न जाने कहाँ गई
छाँव पाने को दिल मचलता है
माँ ! तू जबसे दूजे जहाँ गई
ये घर बिन चाट का लगता है
माँ के बारे में इतनी गंभीर बात अगर कोई लिख सकता है तो उसके बारे में हास्य की अवधारण सिरे से खारिज हो जाती है स्वतः ही । बस ये कहूँ के मशहूर शईर जनाब मुनव्वर राणा साहिब के बाद समीर जी को ही पढा इस तरह से माँ पे । इस कविता के लिए उनके लेखनी को सलाम ।
छंद मुक्तक कवितायें :- जरा इस गहरी और अप्रतिम सोच को पढ़े और कहें की क्या ये समीर लाल जी ने ही लिखी है ??? तो मैं कहता हूँ जरा मजाकिए किस्म के इंसान के इस गहरी सोच का क्या कोई अंदाजा लगा पायेगा। जो आपनी सरल भाषा शैली जो मूलतः बोल चाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है मानस पटल पे इतनी गहरी छाप छोडेगी ...... ।
बनाना आता है
मुझे अवाक देख
दीवार पर लगी काई
मेरी पतनशील सोच को
मुंह चिढा रही है...
२ साहिल पे बैठा
वो जो डूबने से बचने की
सलाह देता है
उसे तैरना नही आता
वरना
बचा सकता था ...
धन्य हुआ मैं तो इस तरह पे सोच को पढ़ के कमाल कर दिया है समीर लाल जी ने॥
अब चलते है ग़ज़ल की ओर जो मेरा सबसे पसंदीदा साहित्यिक भाग है या ये कहूँ के मेरे रगों में बसी है तो ग़लत ना होगा मगर इस पहचानने वाले मेरे गूरू श्री पंकज सुबीर जी है तो इसे निरंतर निखारने में लगे है ॥मगर अभी बात करते है समीर लाल जी के ग़ज़ल लेखन की.........
ग़ज़ल:-
देखता हूँ बैठ कर मैं इस चिता पर कब्रगाह
छोड़ दो इस बात को,ये मजहबी हो जायेगी ॥
समाज में धर्म के नाम पर जो दंगे फसाद हो रहे है और जो आतंक देखने में आ रहा है क्या ये शे'र मुकम्मल तरीके से प्रर्दशित नही कर रहा है इस शेर पे आज के जाने माने ग़ज़लों में खासा दखलंदाजी रखने वाले डाक्टर कुवंर बेचैन साहिब ने उनकी पीठ थपथपाई है, किसके मुंह से इस शे'र पे वाह वाह नही निकलेगी... ये इंसान इंतनी गहरी बात को इतनी आसानी से लिख लेगा हतप्रभ हूँ मगर कोई शक नही॥
एक और शे'र लिखने से अपने आपको रोक ना सका॥
फ़ैल कर के सो सकूँ इतनी जगह मिलती नही
ठण्ड का बस नाम लेकर,मैं सिकुड़ता रह गया ॥
क्या ये शे'र गहरे भावबोध का परिचय नही करा रही है मानसपटल पर...
और छोटे बहर के ये दो शे'र ....
मौत से दिल्लगी हो गई
ज़िन्दगी अजनबी हो गई
साँस गिरवी है हर इक घड़ी
कैसी ये बेबसी हो गई ॥
जैसा की मेरे गूरू देव कहते है के छोटे बहर पे लिखना जितना आसान दीखता है उतना होता नही क्युनके आपको कम शब्द में पुरा का पुरा कथ्य को सम्पूर्ण करना होता है ,इस बात पे समीर जी के क्या कहने छोटी बहर के उस्ताद शाईर ....
मुक्तक:-
सिर्फ़ एक मुक्तक ने मेरा दिल लूट लिया .....
नज़र पड़ती है धरती पर,वहाँ तारे भी रोते है
असर है खौफ का ऐसा खुली आँखों ही सोते है
सजगा जब तलक होगी,ज़रा हम चैन पा लेंगे
अधिकतर चुक के किस्से,बड़े शहरों में होते है॥
कितने खुले विचार को शब्द बोध में बाँध कर के रखा है समीर लाल जी ने ॥
क्षणिकाएं:-
एक गरीब और बेचारी मान को देखिये कैसे बच्चे को जीना सिखाती है...
रोटी के लिए
बच्चे की जिद
और वो बेबस लाचार माँ
उसे मारती है,
वो जानती है भूख का दर्द
मार के दर्द में
कहीं खो जायेगा
कुछ देर को ही सही
बच्चा रोते रोते
सो जायेगा ॥
एक और समसामयीक पे क्षणिका इसके बाद आपको भी पता लग जायेगा के समीर लाल जी कितने ठोस ब्यंग्कार है ...
ऊँचे अंक लाने के बाद भी
वो प्रतिक्षा सूचि में
खडा है...
आरक्षण का तमाचा
सीधा उसके गाल पर
पडा है....
देखिये इस लेख और रचना को कितनी गंभीरता लिए हुए है ...
बस यही कहूँगा के कौन कहता है के ये बिखरे मोती है, मैं तो कहता हूँ के ये तो मोतिओं से भरी हुई और सजी हुई माला है जिसके सारे के सारे मोतियाँ मुकम्मल है...आख़िर में मैं समीर लाल जी और अपने बड़े भाई को दिल इस पुस्तक के लिए दिल से बधाई और ढेरो शुभकामनाएं देता हूँ और इसकी असीम सफलता की कामनाएं करता हूँ... साथ में शिवना प्रकाशन का भी आभार....
पुस्तक प्राप्ति :-
मूल्य मात्र रु २००/-
प्रकाशक; शिवना प्रकाशन
पी सी लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड के सामने, सीहोर,
मध्यप्रदेश ४६६००१ भारत ॥
दूरभाष: ९१-९९७७८५५३९९
प्रकाश"अर्श"
१४/०४/२००९
छंद मुक्तक कवितायें :- जरा इस गहरी और अप्रतिम सोच को पढ़े और कहें की क्या ये समीर लाल जी ने ही लिखी है ??? तो मैं कहता हूँ जरा मजाकिए किस्म के इंसान के इस गहरी सोच का क्या कोई अंदाजा लगा पायेगा। जो आपनी सरल भाषा शैली जो मूलतः बोल चाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है मानस पटल पे इतनी गहरी छाप छोडेगी ...... ।
१. दालान से नीचे उतरती
दो सीढियों के
सिल के बीच से
उग आई
कहती है मुझसे
हमें अपनी स्पेसबनाना आता है
मुझे अवाक देख
दीवार पर लगी काई
मेरी पतनशील सोच को
मुंह चिढा रही है...
२ साहिल पे बैठा
वो जो डूबने से बचने की
सलाह देता है
उसे तैरना नही आता
वरना
बचा सकता था ...
धन्य हुआ मैं तो इस तरह पे सोच को पढ़ के कमाल कर दिया है समीर लाल जी ने॥
अब चलते है ग़ज़ल की ओर जो मेरा सबसे पसंदीदा साहित्यिक भाग है या ये कहूँ के मेरे रगों में बसी है तो ग़लत ना होगा मगर इस पहचानने वाले मेरे गूरू श्री पंकज सुबीर जी है तो इसे निरंतर निखारने में लगे है ॥मगर अभी बात करते है समीर लाल जी के ग़ज़ल लेखन की.........
ग़ज़ल:-
देखता हूँ बैठ कर मैं इस चिता पर कब्रगाह
छोड़ दो इस बात को,ये मजहबी हो जायेगी ॥
समाज में धर्म के नाम पर जो दंगे फसाद हो रहे है और जो आतंक देखने में आ रहा है क्या ये शे'र मुकम्मल तरीके से प्रर्दशित नही कर रहा है इस शेर पे आज के जाने माने ग़ज़लों में खासा दखलंदाजी रखने वाले डाक्टर कुवंर बेचैन साहिब ने उनकी पीठ थपथपाई है, किसके मुंह से इस शे'र पे वाह वाह नही निकलेगी... ये इंसान इंतनी गहरी बात को इतनी आसानी से लिख लेगा हतप्रभ हूँ मगर कोई शक नही॥
एक और शे'र लिखने से अपने आपको रोक ना सका॥
फ़ैल कर के सो सकूँ इतनी जगह मिलती नही
ठण्ड का बस नाम लेकर,मैं सिकुड़ता रह गया ॥
क्या ये शे'र गहरे भावबोध का परिचय नही करा रही है मानसपटल पर...
और छोटे बहर के ये दो शे'र ....
मौत से दिल्लगी हो गई
ज़िन्दगी अजनबी हो गई
साँस गिरवी है हर इक घड़ी
कैसी ये बेबसी हो गई ॥
जैसा की मेरे गूरू देव कहते है के छोटे बहर पे लिखना जितना आसान दीखता है उतना होता नही क्युनके आपको कम शब्द में पुरा का पुरा कथ्य को सम्पूर्ण करना होता है ,इस बात पे समीर जी के क्या कहने छोटी बहर के उस्ताद शाईर ....
मुक्तक:-
सिर्फ़ एक मुक्तक ने मेरा दिल लूट लिया .....
नज़र पड़ती है धरती पर,वहाँ तारे भी रोते है
असर है खौफ का ऐसा खुली आँखों ही सोते है
सजगा जब तलक होगी,ज़रा हम चैन पा लेंगे
अधिकतर चुक के किस्से,बड़े शहरों में होते है॥
कितने खुले विचार को शब्द बोध में बाँध कर के रखा है समीर लाल जी ने ॥
क्षणिकाएं:-
एक गरीब और बेचारी मान को देखिये कैसे बच्चे को जीना सिखाती है...
रोटी के लिए
बच्चे की जिद
और वो बेबस लाचार माँ
उसे मारती है,
वो जानती है भूख का दर्द
मार के दर्द में
कहीं खो जायेगा
कुछ देर को ही सही
बच्चा रोते रोते
सो जायेगा ॥
एक और समसामयीक पे क्षणिका इसके बाद आपको भी पता लग जायेगा के समीर लाल जी कितने ठोस ब्यंग्कार है ...
ऊँचे अंक लाने के बाद भी
वो प्रतिक्षा सूचि में
खडा है...
आरक्षण का तमाचा
सीधा उसके गाल पर
पडा है....
देखिये इस लेख और रचना को कितनी गंभीरता लिए हुए है ...
बस यही कहूँगा के कौन कहता है के ये बिखरे मोती है, मैं तो कहता हूँ के ये तो मोतिओं से भरी हुई और सजी हुई माला है जिसके सारे के सारे मोतियाँ मुकम्मल है...आख़िर में मैं समीर लाल जी और अपने बड़े भाई को दिल इस पुस्तक के लिए दिल से बधाई और ढेरो शुभकामनाएं देता हूँ और इसकी असीम सफलता की कामनाएं करता हूँ... साथ में शिवना प्रकाशन का भी आभार....
पुस्तक प्राप्ति :-
मूल्य मात्र रु २००/-
प्रकाशक; शिवना प्रकाशन
पी सी लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड के सामने, सीहोर,
मध्यप्रदेश ४६६००१ भारत ॥
दूरभाष: ९१-९९७७८५५३९९
प्रकाश"अर्श"
१४/०४/२००९






